सासाराम का एक पुराना और दिलचस्प इतिहास है। प्राचीनता और ऐतिहासिक विशिष्टताओं को समेटे इस जिले में ऐतिहासिक स्थलों की भरमार है। लेरूआ गांव का इतिहास (Lerua Sasaram History) भी इसी समृद्ध विरासत का हिस्सा है। सासाराम शहर से मात्र 8 किलोमीटर और सासाराम की नगर देवी मां ताराचण्डी के धाम से मात्र 3 किलोमीटर दूर स्थित लेरूआ गांव में पूर्व मध्यकालीन मंदिर के अवशेष इधर-उधर बिखरे पड़े हुए हैं। इतिहासकार इन अवशेषों को देखकर बताते हैं कि अपने समय में यह एक प्रमुख और अत्यंत महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल रहा होगा।
इन बिखरे हुए पत्थरों और खंडित मूर्तियों को देखकर एक सवाल मन में उठता है—जिस स्थान पर कभी इतना महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल रहा होगा, आज उसकी ऐतिहासिक पहचान किस रूप में बची है? लेरूआ मंदिर के अवशेष केवल पुराने पत्थर नहीं, बल्कि उस दौर की कला, आस्था और मंदिर स्थापत्य को समझने का एक महत्वपूर्ण माध्यम भी हो सकते हैं।
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लंका की तरह लेरूआ मंदिर कीर्तिमुख जड़ित था

सासाराम प्रखंड के लेरूआ गांव का पूर्व मध्यकालीन मंदिर कीर्तिमुख जड़ित था। एक पौराणिक वर्णन के अनुसार, लंका के प्रवेशद्वार पर राक्षसों के गुरु शुक्राचार्य द्वारा कीर्तिमुख का जीवंत निर्माण किया गया था। इस वर्णन में कहा जाता है कि शुक्राचार्य ने रुद्र कीर्तिमुख नाम का दारुपंच अस्त्र लंका के प्रवेशद्वार पर स्थापित किया था। मान्यता के अनुसार, इसके माध्यम से बाहर होने वाली प्रत्येक गतिविधि चित्रित होकर दिखाई देती थी। हालांकि, इस विशेष वर्णन की ऐतिहासिक या वैज्ञानिक पुष्टि उपलब्ध नहीं है।
कीर्तिमुख का अर्थ है ‘कीर्ति का मुख’ या ‘गौरवशाली मुख’ (Face of Glory)। भारतीय मंदिर स्थापत्य में यह एक महत्वपूर्ण अलंकरण है। इसे प्रायः विशाल मुख, उभरी हुई आंखों और प्रभावशाली आकृति के रूप में दर्शाया जाता है। पारंपरिक धार्मिक कला में इस आकृति का संबंध रक्षा और अमंगल से बचाव की प्रतीकात्मक मान्यताओं से रहा है।
दिलचस्प बात यह है कि कीर्तिमुख की कलात्मक परंपरा केवल भारत तक सीमित नहीं रही। न्यूयॉर्क के मेट्रोपॉलिटन म्यूजियम ऑफ आर्ट के अनुसार, इस प्रतीक के विभिन्न रूप भारत, तिब्बत, चीन और इंडोनेशिया की धार्मिक कलाओं में भी मिलते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि लेरूआ मंदिर से जुड़ा कीर्तिमुख भारतीय उपमहाद्वीप की एक व्यापक और प्राचीन कलात्मक परंपरा के संदर्भ में महत्वपूर्ण है।
बिहार की पालकालीन बौद्ध कला में भी कीर्तिमुख के उदाहरण मिलते हैं। मेट्रोपॉलिटन म्यूजियम में बिहार से संबंधित दसवीं से ग्यारहवीं शताब्दी का एक बौद्ध शिल्पखंड संरक्षित है, जिसमें बुद्ध की आकृति के ऊपर कीर्तिमुख अंकित है। हालांकि, यह उदाहरण लेरूआ मंदिर की तिथि या उसके निर्माणकाल का प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं है, लेकिन क्षेत्रीय कला परंपराओं को समझने में एक उपयोगी संदर्भ प्रस्तुत करता है।
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भगवान सूर्य और उनके पुत्र रेवंत की मूर्तियाँ भी मौजूद हैं
इसके अलावा यहां भगवान सूर्य और उनके पुत्र रेवंत की मूर्तियां भी मौजूद हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, रेवंत की उत्पत्ति सूर्य की बड़वा (घोड़ी) का रूप धारण करने वाली पत्नी संज्ञा से हुई थी। भारतीय धार्मिक परंपराओं में रेवंत को अश्वों, आखेट और वनमार्गों की रक्षा से जुड़े देवता के रूप में भी जाना जाता है।
रेवंत की प्रतिमाओं का महत्व केवल पौराणिक कथाओं तक सीमित नहीं है। प्राचीन भारतीय मूर्तिकला में उन्हें प्रायः घोड़े पर सवार योद्धा या आखेटक के रूप में दर्शाया गया है। अमेरिका के लॉस एंजेलिस काउंटी म्यूजियम ऑफ आर्ट के संग्रह में सारनाथ क्षेत्र से संबंधित प्रारंभिक सातवीं शताब्दी की रेवंत प्रतिमा भी दर्ज है। ऐसे ऐतिहासिक उदाहरण बताते हैं कि रेवंत का चित्रण भारतीय मूर्तिकला की पुरानी परंपराओं का हिस्सा रहा है।
लेरूआ गांव में सूर्य और रेवंत से जुड़ी मूर्तियों की मौजूदगी इस स्थान के धार्मिक और कलात्मक महत्व को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत है। हालांकि, मंदिर के सटीक निर्माणकाल, स्थापत्य और मूर्तियों के विस्तृत इतिहास को निर्धारित करने के लिए प्रमाणित पुरातात्त्विक अध्ययन आवश्यक है।
इतिहासकार क्या कहते हैं?
पटना स्थित डॉ. के.पी. जायसवाल शोध संस्थान के पूर्व शोध अन्वेषक श्याम सुंदर तिवारी जी कहते हैं कि लेरूआ गांव में स्थित प्राचीन मंदिर के ध्वंसावशेषों को नष्ट होने से बचाकर सहेजने की जरूरत है। उनके अनुसार, इस मंदिर के स्थापत्य में कीर्तिमुख यानी ‘ग्लोरियस फेस’ का इस्तेमाल हुआ था। यह हिंदू, बौद्ध और जैन धर्म के मंदिर स्थापत्य में मुख्य द्वार पर इस्तेमाल किया जाने वाला महत्वपूर्ण कलात्मक प्रतीक है। दक्षिण भारत के मंदिरों में भी इसका प्रतिनिधित्व अधिक मिलता है।

कीर्तिमुख से जुड़ी कुछ पौराणिक कथाओं में यह भी वर्णन मिलता है कि इसके मुख से अग्नि का गोला निकलकर शत्रु का संहार करता था। बाहर की गतिविधियों को देखने और शत्रुओं पर नजर रखने की इस पौराणिक कल्पना की तुलना आज के घरों, दुकानों और अन्य महत्वपूर्ण स्थानों पर लगे सीसीटीवी कैमरों से की जा सकती है। हालांकि, यह केवल एक प्रतीकात्मक तुलना है, किसी प्राचीन तकनीक का प्रमाण नहीं।
Lerua Sasaram History: इन ऐतिहासिक अवशेषों को सहेजना क्यों जरूरी है?
लेरूआ गांव के ये खंडित मंदिर अवशेष सासाराम की उस विरासत की याद दिलाते हैं, जिसके अनेक अध्याय अब भी विस्तृत अध्ययन की प्रतीक्षा कर रहे हैं। किसी प्राचीन शिलाखंड की बनावट, मूर्ति की आकृति और मंदिर की स्थापत्य शैली से इतिहासकार उस दौर की धार्मिक मान्यताओं तथा कलात्मक परंपराओं को समझने की कोशिश करते हैं। ऐसे में इन अवशेषों का सुरक्षित रहना बेहद जरूरी है।
सासाराम और उसके आसपास प्राचीन इतिहास की कई महत्वपूर्ण निशानियां मौजूद हैं। निकटवर्ती ताराचण्डी धाम में राजा प्रताप धवल का ऐतिहासिक शिलालेख भी इसी क्षेत्र की विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। ताराचण्डी धाम में राजा प्रताप धवल के शिलालेख का इतिहास यहां पढ़ें।
लेरूआ मंदिर के अवशेषों का उचित दस्तावेजीकरण, पुरातात्त्विक अध्ययन और संरक्षण इस धरोहर की ऐतिहासिक पहचान को सुरक्षित रखने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकते हैं। क्योंकि इतिहास केवल किताबों के पन्नों में नहीं मिलता। कभी-कभी वह गांव की मिट्टी में बिखरे उन पत्थरों में भी बचा रहता है, जिन्हें हम रोज देखते हुए आगे निकल जाते हैं।










