बिहार के कैमूर जिले में स्थित मां मुंडेश्वरी का मंदिर (Maa Mundeshwari) विचित्र और अति प्राचीन है। मंदिर परिसर में मौजूद शिलालेख इसकी प्राचीनता के प्रमाण हैं। मंदिर के निर्माणकाल को लेकर अलग-अलग ऐतिहासिक मत हैं। कैमूर जिला प्रशासन के अनुसार, यहां मिले शिलालेख मंदिर के लगभग 635 ईस्वी तक प्राचीन होने के संकेत देते हैं, जबकि बिहार पर्यटन विभाग इसे लगभग 108 ईस्वी से जोड़ता है। 19वीं सदी और 20वीं सदी की शुरुआत में कई अंग्रेज विद्वान और पर्यटक यहां आए थे। वर्ष 1915 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने इसे संरक्षित स्मारक का दर्जा दिया था। यह मंदिर भारत के उन अति प्राचीन धार्मिक स्थलों में गिना जाता है, जहां सदियों से पूजा-अर्चना की परंपरा जारी रहने की मान्यता है।
विभिन्न प्रकाशित विवरणों के अनुसार, 1968 में पुरातत्व विभाग ने यहां की 97 दुर्लभ मूर्तियों को सुरक्षा की दृष्टि से पटना संग्रहालय में रखवाया था। आपको बताते चलें कि यहां की तीन दुर्लभ मूर्तियां कोलकाता के संग्रहालय में भी मौजूद होने का उल्लेख मिलता है। इन मूर्तियों की संख्या और स्थानांतरण संबंधी विवरण की स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि अभी उपलब्ध नहीं है।

यह मंदिर कैमूर जिले के भगवानपुर प्रखंड में कैमूर पर्वतश्रेणी की पवरा पहाड़ी पर स्थित है। यह प्राचीन मंदिर लगभग 608 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। मुंडेश्वरी मंदिर अष्टकोणीय है। मंदिर का मुख्य द्वार दक्षिण दिशा की तरफ है। पत्थरों से निर्मित इसकी वास्तुकला प्राचीन नागर शैली की विशेषताओं को दर्शाती है। मंदिर में देवी मुंडेश्वरी और भगवान शिव की उपासना होती है। इसकी प्राचीन संरचना और शिल्पकला ऐतिहासिक तथा पुरातात्विक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। इस मंदिर से जुड़ी पौराणिक मान्यताओं का संबंध मार्कण्डेय पुराण में वर्णित देवी महात्म्य की कथाओं से जोड़ा जाता है। मंदिर में चंड-मुंड के वध से जुड़ी कई कथाएं प्रचलित हैं।
आपको बताते चलें कि पौराणिक कथाओं के अनुसार, चंड-मुंड, शुंभ-निशुंभ के सेनापति थे, जिनका वध इसी भूमि पर हुआ माना जाता है। मंदिर हिंदू श्रद्धालुओं के साथ अन्य धर्मों के लोगों के लिए भी आकर्षण का केंद्र रहा है। यहां आने वाले लोग माता के दर्शन करने के साथ-साथ बलि देने की अनोखी परंपरा को भी देखते हैं।
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मां मुंडेश्वरी धाम (Maa Mundeshwari) में अलग है बलि देने की प्रक्रिया

मां मुंडेश्वरी के मंदिर में कुछ ऐसा होता है, जिस पर श्रद्धालु दांतों तले उंगलियां दबा लेते हैं। यहां बलि में बकरा चढ़ाया जाता है, लेकिन उसकी जान नहीं ली जाती। बल्कि उसे मंदिर में लाकर देवी मां के सामने खड़ा किया जाता है। इसके बाद पुरोहित मंत्रोच्चार करते हुए बकरे पर अक्षत यानी चावल के दाने छिड़कता है।
स्थानीय मान्यता के अनुसार, अक्षत छिड़कने के बाद बकरा कुछ देर के लिए अचेत-सा हो जाता है। इसके बाद दोबारा अक्षत छिड़कने की प्रक्रिया होती है और बकरा उठ खड़ा होता है। फिर उसे जीवित ही छोड़ दिया जाता है। इस अनोखी परंपरा को देखने वाले श्रद्धालु हैरान रह जाते हैं। इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषताओं में पशु बलि की यह सात्विक और रक्तविहीन परंपरा शामिल है। श्रद्धालु इसे माता की कृपा मानते हैं, हालांकि इस घटना की वैज्ञानिक व्याख्या को स्थापित तथ्य नहीं माना जा सकता।
मां शक्ति ने किया था चंड-मुंड का वध

पौराणिक कथाओं के अनुसार, चंड-मुंड नाम के असुरों का वध करने के लिए जब मां भवानी यहां आई थीं, तो चंड के विनाश के बाद मुंड युद्ध करते हुए इसी पहाड़ी में छिप गया था। यहीं पर माता ने मुंड का वध किया था। इसलिए माता मुंडेश्वरी देवी के नाम से प्रसिद्ध हुईं। यह कथा स्थानीय धार्मिक मान्यताओं और शक्ति उपासना की परंपरा से जुड़ी हुई है। पहाड़ी पर कई पत्थर और स्तंभ बिखरे हुए हैं, जिन पर मौजूद आकृतियों को देखकर स्थानीय लोग उन्हें श्रीयंत्र और अन्य सिद्ध यंत्र-मंत्रों से जोड़ते हैं। हालांकि इन आकृतियों की पहचान के लिए पुरातात्विक अध्ययन आवश्यक है।
यहां के शिवलिंग का बदलता है रंग

मां मुंडेश्वरी धाम के गर्भगृह के अंदर प्राचीन पंचमुखी शिवलिंग विराजमान होने का उल्लेख कैमूर जिला प्रशासन के विवरण में मिलता है। इसकी विशेषता यह बताई जाती है कि सुबह, दोपहर और शाम को इसका रंग अलग-अलग दिखाई देता है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, सूर्य की रोशनी और उसकी बदलती स्थिति के साथ शिवलिंग की रंगत में अंतर दिखाई देता है। हर सोमवार को बड़ी संख्या में भक्त यहां शिवलिंग पर जलाभिषेक करने आते हैं। यहां के पुजारी भगवान भोलेनाथ के शिवलिंग का सुबह शृंगार और रुद्राभिषेक करते हैं।
लोकमान्यता: औरंगजेब नहीं तोड़ पाया इस मंदिर को !!
स्थानीय लोगों के बीच एक कथा प्रचलित है कि मुगल शासक औरंगजेब के समय इस मंदिर को तोड़ने का प्रयास किया गया था। कहा जाता है कि मजदूर मंदिर तोड़ने के काम में लग गए थे, लेकिन इस दौरान उनके साथ विचित्र अनहोनी घटनाएं होने लगीं। भयभीत होकर मजदूर काम छोड़कर भाग खड़े हुए और फिर कोई मजदूर मंदिर तोड़ने के लिए राजी नहीं हुआ। स्थानीय लोग मंदिर की कुछ भग्न मूर्तियों (खंडित मूर्तियों) को भी इस कथा से जोड़ते हैं। हालांकि औरंगजेब द्वारा मंदिर तोड़वाने के प्रयास और इन मूर्तियों के खंडित होने के कारणों की स्वतंत्र ऐतिहासिक पुष्टि नहीं मिली है। इसलिए इसे प्रमाणित इतिहास के बजाय स्थानीय जनश्रुति के रूप में ही समझना चाहिए।
इसे जानना जरूरी है
मां मुंडेश्वरी धाम में शारदीय और चैत्र नवरात्र के अवसर पर श्रद्धालु दुर्गा सप्तशती का पाठ करते हैं। साल में दो बार माघ और चैत्र में यहां यज्ञ होता है। रामनवमी और महाशिवरात्रि के अवसर पर भी मंदिर का विशेष धार्मिक महत्व रहता है। कैमूर की पहाड़ियों में स्थित यह धाम प्राचीन स्थापत्य, इतिहास और जीवंत आस्था का अनोखा संगम है। इसी कैमूर पर्वतश्रेणी में शक्ति उपासना के एक अन्य महत्वपूर्ण केंद्र, सासाराम स्थित मां ताराचंडी धाम के बारे में भी आप पढ़ सकते हैं।
मां मुंडेश्वरी धाम (Maa Mundeshwari) पहुंचने के टिप्स

मुंडेश्वरी मंदिर पहुंचने के लिए सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन भभुआ रोड (मोहनिया रेलवे स्टेशन) है। स्टेशन से करीब 25 किलोमीटर की दूरी पर मंदिर स्थित है। मोहनिया से सड़क मार्ग के द्वारा आसानी से मुंडेश्वरी धाम पहुंचा जा सकता है। कैमूर जिला प्रशासन के अनुसार, भभुआ रोड स्टेशन से मंदिर के लिए बस या भभुआ होकर स्थानीय वाहन का विकल्प उपलब्ध रहता है। पहाड़ी के शिखर पर स्थित मंदिर तक पहुंचने के लिए पहाड़ को काटकर सीढ़ियां और रेलिंगयुक्त सड़कें बनाई गई हैं। सड़क मार्ग से दोपहिया और चारपहिया वाहन भी मंदिर तक पहुंच सकते हैं।
मंदिर की यात्रा की योजना बनाते समय सितंबर से अप्रैल के बीच का मौसम अपेक्षाकृत अनुकूल माना जाता है। नवरात्र जैसे प्रमुख पर्वों पर श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ सकती है। दर्शन के लिए जाते समय स्थानीय व्यवस्थाओं की जानकारी पहले प्राप्त कर लेना बेहतर है। मंदिर के ऐतिहासिक महत्व और धार्मिक परंपराओं का सम्मान करते हुए परिसर की स्वच्छता तथा प्राचीन संरचनाओं के संरक्षण का ध्यान रखना भी आवश्यक है। अधिक जानकारी के लिए कैमूर जिला प्रशासन के आधिकारिक यात्रा-निर्देश देख सकते हैं।


