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भारत का वो बादशाह , जिसके डर से हुमायूँ 15 साल बाहर रहा हिंदुस्तान से | चौसा युद्ध – Battle of Chausa

जो लोग अपने अतीत को याद नहीं रख सकते, वे उसे दोहराने के लिए अभिशप्त हैं — जॉर्ज सांतायाना, प्रसिद्ध दार्शनिक । गंगा के किनारे बसा चौसा केवल एक ऐतिहासिक स्थल नहीं, बल्कि सदियों पुरानी पौराणिक मान्यताओं और शौर्य गाथाओं का साक्षी है। यहीं शेरशाह सूरी की कूटनीति ने इतिहास की दिशा बदल दी और हुमायूँ की पराजय ने उत्तर भारत की सत्ता में एक नए अध्याय की नींव रखी।

बक्सर, पूर्वी उत्तर प्रदेश की सीमा के किनारे स्थित भारत के पूर्वी राज्य बिहार का एक प्रसिद्ध ऐतिहासिक शहर है, जो मध्यकाल में बक्सर की लड़ाई और हुमायूँ तथा शेरशाह सूरी के बीच हुए चौसा के युद्ध (चौसा युद्ध – Battle of Chausa)के लिए दुनिया भर में मशहूर हुआ था।

पौराणिक सनातन संस्कृति के गर्भ में चौसा

महर्षि च्यवन मुनि से चौसा का पुराना रिश्ता रहा है। इन्हीं के नाम पर इसका नामकरण चौसा हुआ था। चौसा का इलाका गंगा नदी के किनारे बसा एक छोटा-सा कस्बा है।

मध्यकाल में चौसा का युद्ध दुनिया भर में मशहूर हुआ

26 जून 1539 ई. को चौसा में हुमायूँ और शेरशाह सूरी के बीच चौसा का भीषण युद्ध हुआ था। इस युद्ध में आक्रांता हुमायूँ बुरी तरह पराजित हुआ और उसे अपनी जान बचाकर भागना पड़ा था। वह अपने घोड़े के साथ गंगा में कूद गया और एक कश्ती की मदद से डूबने से बच गया था।

शेरशाह का सुल्तान बनने का सफर

चौसा युद्ध में विजय के बाद शेरशाह बंगाल और बिहार का सुल्तान बन गया और उसने ‘सुल्तान-ए-आदिल’ की उपाधि धारण की। आपको बताते चलें कि हुमायूँ का सबसे बड़ा शत्रु शेर खाँ ही था।

बंगाल में विजय प्राप्ति के बाद हुमायूँ निश्चिंत होकर आराम फरमाने लगा था। हुमायूँ को बंगाल में आराम करता देख शेर खाँ ने क्रमशः चुनार, बनारस, जौनपुर, कन्नौज, पटना इत्यादि पर अधिकार स्थापित कर लिया। शेरशाह की इन उपलब्धियों ने हुमायूँ को विचलित कर दिया था।

कमजोर पड़ा हुमायूँ

मलेरिया बीमारी के बढ़ते प्रकोप से हुमायूँ की सेना कमजोर पड़ गई थी। इसलिए हुमायूँ सेना की एक छोटी टुकड़ी लेकर ही आगरा के लिए कूच कर गया।

हुमायूँ के वापस लौटने की सूचना पाकर शेरशाह ने रास्ते में ही हुमायूँ को घेरने का निर्णय किया। हुमायूँ ने वापसी में कई गलतियाँ कीं। सबसे पहली गलती यह थी कि उसने अपनी सेना को दो भागों में बाँट दिया था।

सेना की एक टुकड़ी दिलावर खाँ के नेतृत्व में बिहार के मुंगेर जिले पर आक्रमण करने के लिए भेजी गई थी, जबकि सेना की दूसरी टुकड़ी के साथ हुमायूँ खुद आगे बढ़ा।

नहीं मानी सलाहकारों की बात!

हुमायूँ के सलाहकारों ने उसे सलाह दी थी कि वह गंगा के उत्तरी किनारे से चलता हुआ जौनपुर पहुँचे और गंगा पार करते ही शेरशाह पर हमला कर दे, परंतु उसने उन लोगों की बात नहीं मानी।

उसने गंगा पार करके दक्षिण मार्ग से चलना शुरू किया। यह सड़क चंद्रगुप्त मौर्य और अशोक महान द्वारा निर्मित उत्तरपथ के नाम से जानी जाती थी, जिसका शेरशाह ने बादशाह बनने के बाद जीर्णोद्धार कराया था।

(ग्रैंड ट्रंक रोड : स्रोत विकिपीडिया)

अर्थात, उसने ग्रैंड ट्रंक रोड से चलना शुरू किया। यह सड़क शेर खाँ के नियंत्रण में थी। आपको बताते चलें कि उस समय शेरशाह बादशाह नहीं बना था। इसलिए यह सड़क अंग्रेजों के समय की जीटी रोड या शेरशाह के समय की बादशाही सड़क अथवा जर्नैली सड़क नहीं, बल्कि मौर्यकालीन उत्तरपथ थी।

कर्मनासा नदी के किनारे बक्सर के चौसा में उसे शेरशाह के होने का पता चला। इसलिए वह नदी पार करके शेरशाह पर आक्रमण करने को उतारू हो उठा, लेकिन यहाँ भी उसने एक गलती कर दी।

यहाँ उसने तत्काल शेरशाह पर आक्रमण नहीं किया। वह तीन महीनों तक गंगा नदी के किनारे समय बर्बाद करता रह गया। शेरशाह ने इस बीच उसे धोखे से शांति-वार्ता में उलझाए रखा और अपनी सैन्य तैयारियाँ करता रहा। वह बरसात की प्रतीक्षा कर रहा था।

शेरशाह की जबरदस्त कूटनीति

चौसा युद्ध 1539 में शेरशाह सूरी और हुमायूँ के बीच युद्ध का ऐतिहासिक चित्रण
चौसा युद्ध : शेरशाह सूरी और हुमायूँ | चित्र स्रोत : Farbound.net

वर्षा ऋतु के शुरू होते ही शेरशाह ने आक्रमण की योजना बनाई। हुमायूँ का शिविर गंगा और कर्मनासा नदी के बीच एक नीची जगह पर स्थित था, जिसके चलते बरसात का पानी इसमें भर गया। मुगलों का तोपखाना खराब हो गया और सेना में अव्यवस्था व्याप्त हो गई।

इस मौके का लाभ उठाकर 26 जून 1539 की रात में शेरशाह ने मुगल छावनी पर अचानक, बिना वक्त गँवाए, धोखे से आक्रमण कर दिया। मुगल खेमे में खलबली मचनी तय थी, हुआ भी यही। सैनिक जान बचाने के लिए गंगा नदी में कूदने लगे। उनमें कुछ डूबकर मरे और कुछ शेरशाह की अफगान सेनाओं द्वारा मारे गए।

जान बचाकर भागा हुमायूँ

परिस्थिति को भाँपकर हुमायूँ भी अपनी जान बचाकर गंगा पार कर भाग गया। भागते समय उसका परिवार शिविर में ही रह गया। हुमायूँ अपने कुछ विश्वसनीय मुगलों की सहायता से आगरा पहुँच सका। हुमायूँ की पूरी सेना बर्बाद हो गई।

चौसा युद्ध के सुनहरे परिणाम

चौसा युद्ध 1539 से संबंधित ऐतिहासिक स्थल, बक्सर बिहार
चित्र स्रोत : भारत सरकार
  • चौसा के भीषण युद्ध के बाद हुमायूँ का पतन तय हो गया था, क्योंकि उसकी सेना नष्ट हो चुकी थी। उसके परिवार के कुछ सदस्य भी इस युद्ध में मारे गए थे।
  • इस युद्ध में विजय के बाद अफगानों की शक्ति और महत्त्वाकांक्षाएँ पुनः बढ़ गईं। अब वे मुगलों को आगरा से भी भगाकर आगरा पर अधिकार करने की योजनाएँ बनाने लगे।
  • शेर खाँ ने इस युद्ध के बाद शेरशाह की उपाधि धारण की।
  • शेरशाह ने अपने नाम का ‘खुतबा’ पढ़वाया, सिक्के ढलवाए और कई नए फरमान जारी किए।
  • उसने जलाल खाँ को बंगाल भेजकर बंगाल पर भी अधिकार कर लिया। शेरशाह खुद बनारस, जौनपुर और लखनऊ होता हुआ कन्नौज जा पहुँचा।

कैसे पहुँचें चौसा?

सड़क मार्ग : सड़क मार्ग बेहतर विकल्प हो सकता है। बक्सर से चौसा की दूरी लगभग 10–15 किलोमीटर है।

रेल मार्ग : चौसा में रेलवे स्टेशन है।

हवाई मार्ग : नजदीकी हवाई अड्डे पटना और बनारस में हैं।

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