सासाराम, रोहतास और नौहट्टा रेंज में कैमूर पहाड़ी के जंगलों में तेंदू पत्ते 2024 में अनुकूल मौसम के कारण बहुत बड़ी मात्रा में निकले थे। ये पेड़ फल और पत्तों के साथ जंगलों की खूबसूरती बिखेर रहे थे। ऐसे में अभयारण्य क्षेत्र में लहलहा रहे 70 करोड़ रुपये से अधिक मूल्य के बताए गए तेंदू पत्तों पर वन माफियाओं की ललचाई नजर होने की आशंका जताई गई थी। इस रिपोर्ट में जंगलों में संदिग्ध गतिविधियों की चिंता जताई गई थी। आशंका थी कि करीब एक सप्ताह बाद पत्तों की तोड़ाई शुरू होने पर अवैध कारोबार से जुड़े लोग सक्रिय हो सकते हैं। सासाराम के जंगलों में तेंदू पत्ता (Tendu Leaves) प्राकृतिक संपदा के साथ-साथ स्थानीय आजीविका से भी जुड़ा है।
संदर्भ: यह रिपोर्ट 13 मई 2024 को प्रकाशित हुई थी। इसमें उल्लिखित 70 करोड़ रुपये के अनुमान और उस समय की आशंकाओं को वर्तमान स्थिति या किसी व्यक्ति के विरुद्ध प्रमाणित आरोप के रूप में न पढ़ें।
सासाराम के जंगलों को बचाने में शहीद हो चुके हैं डीएफओ

भारतीय वन सेवा के वरिष्ठ अधिकारी डीएफओ संजय सिंह की शहादत सासाराम में हुई थी। नक्सलियों ने डीएफओ संजय सिंह को इन्हीं जंगलों में शहीद किया था। उनकी शहादत रेहल में हुई थी। सासाराम अनुमंडल के चेनारी, दरीगांव, गीताघाट, ताराचंडी, गोरियां और चिरइयां से लेकर डेहरी अनुमंडल के तिलौथू, तुतला, नौहट्टा और रोहतास तक जंगल फैले हैं। कैमूर पहाड़ी की वन शृंखला बिहार के भभुआ और सासाराम से लेकर उत्तर प्रदेश के सोनभद्र और विंध्याचल क्षेत्र तक विस्तार पाती है।
15 फरवरी 2002 को रेहल में डीएफओ संजय सिंह की हत्या हुई थी। वन संपदा की रक्षा के लिए उनके संघर्ष और बलिदान की कहानी आज भी इस इलाके के लोगों को याद है।
क्या आपने तिंदुक नाम पहले कभी सुना है? असल में तिंदुक नाम बहुत कम लोगों ने सुना होगा, लेकिन तेंदू, केंदू, गाब और गाभ नाम बहुत जाने-पहचाने हैं। तेंदू एक प्रकार का फल होता है, जो चीकू की तरह मीठा होता है और पारंपरिक आयुर्वेदिक वर्णनों में भी इसका उल्लेख मिलता है। इसे सासाराम (बिहार) और मध्य प्रदेश में ‘तेंदू’ तथा छत्तीसगढ़, ओडिशा और झारखंड में ‘केंदू’ कहते हैं। इसका वानस्पतिक नाम Diospyros melanoxylon है।
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जीवन का आधार केंदू | Tendu Leaves

यह वृक्ष ज्यादातर घने जंगलों में पाया जाता है। यह जंगल में रहने वालों के लिए केवल आय का साधन नहीं, अपितु जीवनयापन का आधार है। तेंदू के फल हल्के पीले रंग के होते हैं। शायद आप सोच रहे होंगे कि इस छोटे-से फल को बीमारियों के पारंपरिक उपचार में कैसे इस्तेमाल किया जाता है। यह बात जानने से पहले इसके बारे में जान लेते हैं।
फिल्म पुष्पा: द राइज में लाल चंदन की तस्करी पर आधारित एक काल्पनिक कहानी दिखाई गई है। तेंदू पत्तों का कारोबार उससे अलग है, लेकिन यह फिल्म वन संपदा पर अवैध कब्जे और तस्करी जैसे विषयों को समझने के लिए एक सांस्कृतिक संदर्भ देती है। फिल्म की कहानी को सासाराम की घटनाओं का प्रमाण नहीं माना जाना चाहिए।
बिहार वानिकी विकास निगम के अनुसार, केंदू पत्ता राज्य का एक महत्वपूर्ण गैर-काष्ठ वन उत्पाद है। इसके पत्तों का उपयोग बीड़ी बनाने में होता है और संग्रहण से ग्रामीण एवं वनवासी समुदायों को आजीविका मिलती है। तेंदू पत्ता सासाराम के जंगलों की जैविक संपदा होने के साथ स्थानीय अर्थव्यवस्था से भी जुड़ा है। बिहार वानिकी विकास निगम की केंदू पत्ता संबंधी जानकारी पढ़ें।
रोहतासगढ़ के वनवासी जीवन, स्थानीय वन उत्पादों और संस्कृति की झलक के लिए रोहतासगढ़ वनवासी कल्याण महोत्सव की रिपोर्ट भी पढ़ सकते हैं।
तेंदू वृक्षों की बनावट
तेंदू के पेड़ मध्यम आकार के होते हैं। इसके पत्तों से बीड़ी बनाई जाती है। इसकी लकड़ी चिकनी तथा गहरे रंग की होती है। इसका उपयोग फर्नीचर बनाने के लिए किया जाता है। चरक-संहिता के उदर्द-प्रशमन महाकषाय तथा सुश्रुत-संहिता के न्यग्रोधादि-गण में भी इसका वर्णन मिलता है।

यह 8–15 मीटर ऊँचा, मध्यम आकार का, सघन शाखा-प्रशाखाओं वाला वृक्ष होता है। इसकी प्रशाखाएँ अरोमिल तथा तने की छाल गहरे भूरे अथवा लाल रंग की, हल्के खाँचों वाली होती है। इसके पत्ते सरल, एकांतर, 13.7–24 सेमी लंबे एवं लगभग 5 सेमी चौड़े, कुंठाग्र अथवा लगभग लंबाग्र, चिकने तथा चमकीले होते हैं।
तेंदू फूल और फल की विशेषता

इसके फूल एकलिंगी, छोटे, सफेद-पीले रंग के और सुगंधित गुच्छों में होते हैं। इसके फल साधारणतया एकल, 2.5–5 सेमी व्यास (डायमीटर) के, अंडाकार-नुकीले अथवा अर्धगोलाकार होते हैं। ये कच्ची अवस्था में हल्के भूरे तथा पकने पर पीले रंग के होते हैं और कच्चे फल का स्वाद कसैला होता है।
तेंदू फल बेहद फायदेमंद | केंदू फल

इसके फलों के भीतर चीकू के समान मधुर तथा चिकना गूदा रहता है, जिसे खाया जाता है। बीज संख्या में 4–8, गोलाकार अथवा अंडाकार तथा चमकीले होते हैं। ये मार्च से जून के बीच फलते-फूलते हैं। तेंदू स्वाद में थोड़ा कड़वा और आयुर्वेदिक वर्णनों के अनुसार प्रकृति से अम्लीय, गर्म और रूखा माना जाता है। तेंदू को कफ-पित्त से संबंधित पारंपरिक उपयोगों, संग्राही (Constipating), लेखन (Scraping), स्तंभक (Styptic), व्रण (अल्सर) आदि के संदर्भ में बताया गया है। पारंपरिक चिकित्सा में प्रमेह या डायबिटीज, व्रण, रक्तदोष, रक्तपित्त (नाक-कान से खून बहना), दाह या जलन, मेदोरोग (मोटापा), योनिदोष (योनिरोग) तथा पित्तदोष के संदर्भ में भी इसका उल्लेख मिलता है। पका हुआ तेंदू फल मधुर, कुछ देर से पचने वाला तथा आयुर्वेदिक मान्यताओं में कफ बढ़ाने वाला, पित्त कम करने वाला और प्रमेह (मूत्र संबंधी विकार) में उपयोगी माना गया है। ये पारंपरिक उल्लेख हैं, किसी बीमारी को ठीक करने का वैज्ञानिक रूप से स्थापित दावा नहीं।
सासाराम के तेंदू वृक्ष की लकड़ियों की विशेषता
इसकी लकड़ी के सार को पारंपरिक चिकित्सा में पित्त संबंधी रोगों में उपयोगी माना गया है। इसके कच्चे फल स्निग्ध, थोड़े कड़वे, लेखन, लघु, मल को रोकने वाले, शीतल, रूखे, कब्ज से संबंधित पारंपरिक उपयोगों वाले, वातकारक तथा अरुचिकारक बताए गए हैं। तेंदू के फल एवं छाल को स्तंभक (Styptic), दस्त और बुखार से संबंधित पारंपरिक उपयोगों, जीवाणुरोधी गुणों, मुँह व गले के रोगों तथा घाव को सुखाने के संदर्भ में वर्णित किया जाता है।
सासाराम के जंगलों में पाया जाने वाला तेंदू का उपयोग | Kendu Leaves Bihar

पारंपरिक लोक-चिकित्सा और आयुर्वेदिक उल्लेखों में तेंदू से संबंधित निम्नलिखित उपयोग बताए जाते हैं। इनका उल्लेख चिकित्सकीय उपचार की पुष्टि नहीं करता।
- बुखार में
- सूजन में
- हिचकी में
- मुँह के छालों में फायदेमंद तेंदू
- खाँसी में फायदेमंद तेंदू
- आँख संबंधी रोगों में फायदेमंद तेंदू
- कान के दर्द से राहत दिलाने में तेंदू
- लूज मोशन में
- मूत्र मार्ग में अश्मरी या पथरी में
- लकवा में
- जले हुए घाव भरने में
- बीड़ी बनाने में
स्वास्थ्य संबंधी सूचना: किसी भी बीमारी के इलाज के लिए तेंदू फल, पत्ता या छाल का उपयोग डॉक्टर की सलाह के बिना न करें। बीड़ी पीना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।


