Senuar (सेनुआर सभ्यता) का प्राचीन उत्खनन स्थल बिहार के रोहतास जिले के सासाराम अनुमंडल अंतर्गत शिवसागर थाना क्षेत्र में, कैमूर पहाड़ी के दक्षिणी इलाके के पास स्थित सेनुआर गाँव में है। सासाराम जिला मुख्यालय से लगभग 8–9 किमी पश्चिम-दक्षिण दिशा में यह गाँव अवस्थित है। यहाँ एक अति प्राचीन माउंड (टीला) है, जिसका उल्लेख पुरातात्विक अध्ययनों में भी मिलता है। स्थानीय विवरण के अनुसार इसका क्षेत्रफल करीब 21 एकड़ बताया जाता है। इस टीले की परतों में छिपे प्रमाण सासाराम के हजारों साल पुराने जीवन की कहानी सुनाते हैं।
Table of Contents
कब हुई सेनुआर की खुदाई? | Senuar Excavation

बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग के तत्वावधान में सन् 1986–87 और 1989–90 में डॉ. बीरेन्द्र प्रताप सिंह के निर्देशन में इस माउंड (टीले) का उत्खनन कार्य किया गया था। इस शोध में पौधों, पशुओं की हड्डियों और प्राचीन वस्तुओं के अध्ययन से सेनुआर में बसने वाले लोगों के जीवन को समझने की कोशिश की गई।
सेनुआर सभ्यता पर बाज़ार में किताब उपलब्ध है
सेनुआर सभ्यता और खुदाई पर पब्लिकेशन स्कीम, जयपुर (राजस्थान) द्वारा Early Farming Communities of the Kaimur: Excavations at Senuwar, 1986–87, 1989–90 नाम से पुस्तक भी प्रकाशित हुई है। इसके लेखक स्वयं डॉ. बीरेन्द्र प्रताप सिंह हैं, जिन्होंने सेनुआर में उत्खनन का निर्देशन किया था। यह पुस्तक वर्ष 2004 में प्रकाशित हुई थी। पुस्तक की उपलब्धता और कीमत विक्रेता के अनुसार बदल सकती है। इसे पढ़ने से प्राचीन सेनुआर के इतिहास, संस्कृति, खेती और सभ्यता के बारे में विस्तार से पता चलता है। पुस्तक का प्रकाशन विवरण यहाँ देखें।
नवपाषाण युग की प्राचीन सभ्यता है सेनुआर सभ्यता | Senuar Neolithic Civilization

सेनुआर की खुदाई में नवपाषाण युग के सामान मिले। माउंड (टीले) की खुदाई में जो उपकरण तथा सामग्री मिली, वे अति प्राचीन नवपाषाण युग (Neolithic Period / Stone Age) और उसके बाद की सांस्कृतिक अवस्थाओं के प्रमाण हैं। प्रकाशित उत्खनन अध्ययन के अनुसार यहाँ की शुरुआती नवपाषाणकालीन संस्कृति लगभग 2200 ईसा पूर्व तक जाती है। यानी इस इलाके में करीब 4,000 साल से भी पुराने मानव जीवन और संस्कृति की झलक मिलती है।
सेनुआर संस्कृति के लोग कुशल कारीगर थे
उत्खनन कार्य के दौरान मिट्टी के पॉलिशदार बर्तन मिले थे। इन बर्तनों की चमकदार सतह और रंगों की बनावट उस दौर की कुशल कारीगरी का नमूना है। सेनुआर से प्राप्त विभिन्न प्रकार के मृद्भांड प्राचीन लोगों की तकनीक, उपयोग और सौंदर्यबोध को समझने में मदद करते हैं।
सेनुआर सभ्यता में सेरामिक उद्योग यानी मिट्टी के बर्तनों का हुनर फल-फूल रहा था

प्राचीन सेनुआर सभ्यता के लोग मिट्टी के तरह-तरह के बर्तन बनाते थे। इस कारीगरी को आज की भाषा में सेरामिक उद्योग कहा जा सकता है। मिट्टी के बर्तनों की निर्माण-शैली और कुछ सांस्कृतिक समानताओं के आधार पर इतिहासकारों ने सेनुआर की संस्कृति की तुलना दक्षिण भारतीय नवपाषाण संस्कृतियों से भी की है। ऐसी समानताएँ संभावित सांस्कृतिक संपर्क की ओर संकेत करती हैं।
प्राचीन सेनुआर सभ्यता के प्रमाण हैं धातु से बनी वस्तुएँ
आपको बताते चलें कि सेनुआर की खुदाई में धातु से बने उपकरण एवं सामग्री भी मिले हैं। इनका अध्ययन डॉ. पी. के. चट्टोपाध्याय, स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड, दुर्गापुर (पश्चिम बंगाल) ने भी किया था। धातु से बनी ये वस्तुएँ सेनुआर में बाद की सांस्कृतिक अवस्थाओं और तकनीकी विकास को समझने में मदद करती हैं; इन्हें सभी शुरुआती नवपाषाणकालीन वस्तुओं के साथ एक ही समय का नहीं माना जाना चाहिए।

इसके साथ ही डॉ. पी. के. भट्टाचार्य एवं काशी हिंदू विश्वविद्यालय के डॉ. आर. एन. सिंह ने भी धातु से संबंधित वस्तुओं का अपनी रिपोर्टों में उल्लेख किया है। इन अध्ययनों से सेनुआर के प्राचीन इतिहास, संस्कृति एवं सभ्यता की अलग-अलग परतों का पता चलता है।
सिंधु घाटी की सभ्यता और विंध्य क्षेत्र की संस्कृति से रिश्ता
इस पुस्तक (रिपोर्ट) में सेनुआर की संस्कृति की तुलना सिंधु घाटी की सभ्यता से भी की गई है। इतिहासकारों ने विंध्य पर्वत शृंखला की गोद में विकसित संस्कृतियों, विशेषकर बेलन घाटी की नवपाषाण परंपराओं से भी सेनुआर की तुलना की है। ऐसे अध्ययन बताते हैं कि अलग-अलग क्षेत्रों के लोगों की खेती, कारीगरी और जीवनशैली में समानताएँ थीं; इनके बीच संपर्क किस तरह हुआ, यह शोध का विषय है।
विंध्य पर्वत शृंखला का हिस्सा है कैमूर पहाड़ी
आपको बताते चलें कि विंध्य पर्वत शृंखला के पूर्वी विस्तार का एक हिस्सा कैमूर पहाड़ी के नाम से जाना जाता है। सेनुआर सभ्यता इसी कैमूर क्षेत्र की गोद में, सासाराम के पास विकसित हुई थी। पहाड़, नदियाँ और उपजाऊ मैदान—इस पूरे भूभाग ने प्राचीन बसावट तथा खेती को समझने के लिए महत्वपूर्ण पृष्ठभूमि दी है। सासाराम की इसी ऐतिहासिक धरती पर सम्राट अशोक का लघु शिलालेख भी मौजूद है।
क्या सिंधु घाटी की सभ्यता और हड़प्पा संस्कृति के लोग सासाराम पहुँचे?

सिंधु घाटी की सभ्यता और हड़प्पा संस्कृति के पतन के बाद प्राचीन आबादियों, कृषि परंपराओं और सांस्कृतिक प्रभावों के देश के विभिन्न क्षेत्रों तक पहुँचने पर इतिहासकारों ने चर्चा की है। सेनुआर के अध्ययन में भी उत्तर-पश्चिमी भारत की कृषि परंपराओं और कैमूर क्षेत्र के बीच संभावित प्रभाव की बात सामने आती है। यह संभावना रोचक है कि अलग-अलग इलाकों के लोग और उनकी खेती की जानकारी पूर्वी क्षेत्रों तक पहुँची होंगी। हालांकि हड़प्पा के लोगों के सीधे पलायन करके सेनुआर में ही बस जाने का ठोस प्रमाण उपलब्ध अध्ययन से स्थापित नहीं होता। सेनुआर की कहानी को समझते समय इस अंतर को ध्यान में रखना ज़रूरी है।
सेनुआर सभ्यता में बाँस और मिट्टी के घर थे

सेनुआर में हुई खुदाई से यह पता चलता है कि यहाँ बसने वाले प्राचीन लोग लकड़ी, बाँस एवं मिट्टी की झोपड़ियाँ (घर) बनाकर निवास करते थे। उत्खनन अध्ययन में बाँस-लकड़ी के ढाँचे पर मिट्टी की लिपाई और कुटी हुई मिट्टी के फर्श जैसे आवासों के संकेत मिलते हैं। ज़रा सोचिए, जहाँ आज एक गाँव बसा है, वहीं हजारों साल पहले भी लोगों के घर और चूल्हे हुआ करते थे।
कृषि : सेनुआर सभ्यता में खेती जीवन का मुख्य आधार थी

सेनुआर में बसने वाले लोग अच्छे किसान थे। सिंधु घाटी की सभ्यता, हड़प्पा संस्कृति तथा बेलन घाटी (उत्तर प्रदेश) की कृषि परंपराओं के साथ सेनुआर के संबंधों का अध्ययन भी किया गया है। पुरातात्विक शोध में यहाँ धान के साथ बाद की अवस्थाओं में गेहूँ, जौ, चना, मटर और अन्य फसलों से जुड़ी जानकारी मिलती है। इन फसलों की मौजूदगी यह नहीं बताती कि सभी बीज एक ही समय में या किसी एक पलायन के साथ यहाँ लाए गए थे।
खेती इनके जीवन का मुख्य आधार थी। शुरुआती दौर में धान की खेती विशेष महत्व रखती थी, जबकि बाद की सांस्कृतिक अवस्थाओं में अलग-अलग फसलों का महत्व बढ़ा। यानी सेनुआर के लोग केवल जंगली धान या सीमित खेती तक नहीं रहे, बल्कि समय के साथ उनका कृषि जीवन विकसित होता गया।
पशुपालन और शिकार के शौकीन थे सेनुआर सभ्यता के लोग

सेनुआर सभ्यता के लोगों द्वारा बैल, भैंस, बकरी, सुअर इत्यादि पशुओं को पालने के भी प्रमाण मिले हैं। जंगली जानवरों का शिकार भी उनके जीवन का हिस्सा था। खुदाई में मिले हड्डियों के अवशेषों के बारे में डॉ. विजय साठे एवं डॉ. जी. एल. बदाम, डेक्कन कॉलेज पोस्ट ग्रेजुएट एवं रिसर्च संस्थान, पुणे ने अपनी रिपोर्ट में विस्तार से अध्ययन किया कि ये हड्डियाँ किस-किस पशु वर्ग के अवशेष हैं।

रोहतास और सासाराम की ऐतिहासिक विरासत से जुड़ी अन्य कहानियों के लिए शेरशाह सूरी के मकबरे का इतिहास भी पढ़ सकते हैं। सेनुआर की खुदाई पर आधारित शोध का विस्तृत विवरण डॉ. बीरेन्द्र प्रताप सिंह की प्रकाशित पुस्तक में उपलब्ध है।
नोट : अगर इस आर्टिकल पर आपका रिस्पॉन्स अच्छा रहेगा तो सेनुआर उत्खनन और सभ्यता पर इस आर्टिकल का अगला भाग भी लिखूँगा।


