अगर फुर्सत मिले, पानी की तहरीरों को पढ़ लेना,
हर इक दरिया हजारों साल का अफसाना लिखता है।
प्रकृति ने सासाराम शहर को वन, पहाड़ और झरनों के अलावा नदियों से भी नवाजा है। वैसे तो सासाराम और आसपास के इलाकों से कई नदियों की धाराएं निकलती हैं। इनमें कुछ आज भी बह रही हैं, कुछ का प्रवाह कमजोर पड़ चुका है, जबकि कई धाराएं विलुप्त होने के कगार पर हैं। इन सभी नदियों के बारे में कभी बाद में जानेंगे, लेकिन फिलहाल काव नदी (Kao River) पर प्रकाश डालते हैं।
सासाराम की कैमूर पहाड़ियों, मांझर कुंड और धुआं कुंड से जुड़ी काव नदी की कहानी केवल पानी की धारा की कहानी नहीं है। इसमें किसानों की उम्मीदें, पुरानी बस्तियों का इतिहास, स्थानीय मान्यताएं और नदी के अस्तित्व को बचाने की चिंता भी शामिल है।
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काव नदी | Kao River
काव नदी बिहार में गंगा की सहायक नदी प्रणालियों में से एक है। बिहार जल संसाधन विभाग के नदी-बेसिन संबंधी विवरण में भी काव नदी के जलग्रहण क्षेत्र का उल्लेख मिलता है। इसके आसपास कई नगर और बाजार बसे हुए हैं। काओ या काव नदी कभी किसानों के लिए जीवनदायिनी बन जाती है, तो कभी बरसात में कहर बरपाने वाली धारा का रूप अख्तियार कर लेती है।
काव नदी की जन्मस्थली सासाराम है
पुराने शाहाबाद इलाके में गंगा नदी की संगिनी काव नदी की जन्मस्थली सासाराम की कैमूर पहाड़ियों से जुड़ी है। सासाराम के मशहूर मांझर कुंड से आगे बढ़ने वाला पानी जब पत्थरों को चीरता हुआ धुआं कुंड पहुंचता है, तो करीब 130 फुट की ऊंचाई से नीचे गिरकर मानो धरती को प्रणाम करता है।

यहां पानी गिरने की रफ्तार इतनी तेज होती है कि आसपास का वातावरण धुआं-धुआं सा हो जाता है। कुंड का पानी छोटी-छोटी बूंदों के रूप में ऊपर तक उड़ता है। बरसात के मौसम में जब यह झरना अपना शक्तिशाली स्वरूप धारण कर लेता है, उस समय ऊपर से कोई इस मनोरम दृश्य को देखे तो मानो देखते-देखते भीग जाए।
रोहतास जिला प्रशासन के अनुसार, धुआं कुंड सासाराम से लगभग 15 किलोमीटर दूर कैमूर पहाड़ी पर स्थित एक प्राकृतिक पर्यटन स्थल है। जिला प्रशासन की वेबसाइट पर भी इसका उल्लेख मिलता है।
काव नदी की मां है धुआं कुंड
ऊंचाई से धुआं कुंड में गिरने वाला यही पानी आगे बढ़कर काव नदी की धारा को आकार देता है। यह नदी लंबे समय से आसपास की मानव बस्तियों और खेतों के लिए पानी का स्रोत रही है। इसीलिए काव नदी की कहानी में धुआं कुंड मां की भूमिका निभाता है।

इसी धुआं कुंड का पानी आगे चलकर पहाड़ों और चट्टानों के बीच से गुजरता है। स्थानीय विवरणों के अनुसार, लगभग आधे से एक किलोमीटर आगे धारा दाईं दिशा में मुड़कर मैदानी भाग में काव नदी के नाम से प्रवेश करती है।
धुआं कुंड और उसके आसपास के प्राकृतिक सौंदर्य के बारे में विस्तार से पढ़ें: प्रकृति की महफिल सजी है, चले आइए धुआं कुंड सासाराम।
नदी के उद्गम स्थल पर देवी का मंदिर

भारतीय संस्कृति में प्रकृति को मां या देवी माना गया है। कई नदियों के उद्गम स्थलों पर मंदिर बने हुए मिलते हैं। काव नदी के उद्गम क्षेत्र धुआं कुंड पर भी नारी शक्ति की प्रतीक मां दुर्गा का एक मंदिर है।
स्थानीय जानकारी के अनुसार, सासाराम के टकसाल संगत मोहल्ले से जुड़े किसी व्यक्ति या समूह ने इस मंदिर का निर्माण करवाया था। इस मंदिर के पास खड़े होकर पर्यटक झरने का आनंद लेते हैं। यहां फोटोग्राफरों को भी कुंड का बेहद खूबसूरत नजारा मिलता है। हालांकि मंदिर के निर्माणकर्ता और निर्माण-वर्ष की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है।
प्राचीन काल में काव नदी के किनारे मानव सभ्यता

नदियां जीवन देती हैं और नदियों की धारा के साथ जीवन का प्रवाह भी चलता रहता है। स्थानीय विवरणों में ताराचंडी के पास काव नदी के किनारे खुदाई के दौरान प्राचीन अवशेष मिलने की बात कही जाती है। इससे कभी इसी नदी के किनारे मानव सभ्यता के फलने-फूलने की संभावना की ओर संकेत मिलता है। हालांकि इन अवशेषों की तिथि और प्रकृति की पुष्टि के लिए प्रमाणित पुरातात्त्विक रिपोर्ट आवश्यक है।
चेरो-खरवार समुदाय का इतिहास समेटे है प्राचीन काव नदी
इतिहास और स्थानीय परंपराओं में काव नदी के किनारे चेरो तथा खरवार समुदायों के निवास का उल्लेख मिलता है। माना जाता है कि पुराना सहसराम शहर भी इसी नदी के आसपास विकसित हुआ था। रोहतास जिला प्रशासन के आधिकारिक इतिहास विवरण में भी इस क्षेत्र के पुराने निवासियों के संदर्भ में चेरो और खरवार समुदायों का उल्लेख है।
रोहतास के प्राचीन खरवार राजवंश और महान राजा प्रताप धवल के इतिहास के बारे में विस्तार से जानने के लिए पढ़ें: रोहतास के खरवार राजवंश और राजा प्रताप धवल की ऐतिहासिक कहानी।
प्लेग महामारी और काव नदी किनारे की सभ्यता

स्थानीय कथाओं के अनुसार, पुराने समय में एक बार प्लेग जैसी महामारी फैली थी। उससे बचने के लिए लोगों ने काव नदी के तट का सहारा लिया। इसके बाद लोग यहीं बस गए और यह जगह बस्ती में तब्दील हो गई। यह विवरण स्थानीय इतिहास और लोकस्मृति का हिस्सा है; महामारी की तिथि की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है।
काव नदी की तेज धारा के कारण लोगों को अक्सर बाढ़ से नुकसान भी उठाना पड़ता था, लेकिन आम लोगों के लिए यह नदी उतनी ही फलदायी भी थी।
खेती के लिए काव नदी का उपयोग
काव नदी के किनारे खेतों की सिंचाई नदी के पानी से हुआ करती थी। नदी के आसपास कई तरह की फसलें उगाई जाती थीं। पुराने विवरणों में गेहूं और मटर की खेती का भी उल्लेख मिलता है। मूल लेख में 1813 ई. के अंग्रेजी विवरण का हवाला दिया गया था, हालांकि उसके संबंधित मूल अभिलेख की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है।
विशेष रूप से बक्सर के नावानगर से नया भोजपुर तक के किसानों के लिए यह नदी सिंचाई का महत्वपूर्ण स्रोत रही है। वर्षों में नदी के प्रवाह के कमजोर पड़ने से खेती पर भी असर पड़ा है।
काव नदी में सालों भर रहता था पानी

कभी अतिक्रमण और प्रकृति के साथ इंसानों के दुर्व्यवहार के बावजूद सालों भर इस नदी में थोड़ा-बहुत पानी रहता था। कहीं पानी घुटनों तक होता था, तो कहीं इतनी गहराई होती थी कि स्थानीय लोग उसे ‘हाथी डूबने लायक’ कहकर बयान करते थे। हालांकि बरसात में यह नदी अपने उफान पर रहती है।
लेकिन अब स्थिति हर जगह वैसी नहीं है। 18 अप्रैल 2022 को प्रकाशित एक समाचार रिपोर्ट में बक्सर क्षेत्र की काव, ठोरा और अन्य स्थानीय नदियों में गर्मियों के दौरान जलप्रवाह घटने तथा अतिक्रमण बढ़ने की समस्या सामने आई थी।

एक पुराने ऐतिहासिक विवरण का हवाला देकर यह भी बताया जाता है कि वर्ष 1813 के आसपास रोहतास के सूर्यपुरा में नदी की चौड़ाई 50 गज से अधिक थी। इस विशेष आंकड़े के मूल दस्तावेज की पुष्टि अभी अपेक्षित है।
बरसात में काव नदी धारण करती है विकराल रूप
बरसात के मौसम में धुआं कुंड में गिरने वाला पानी इतना खतरनाक हो सकता है कि उसे शब्दों में बयां करना मुश्किल है। जिसने उस मंजर को देखा है, वही उसे महसूस कर सकता है। कुंड की गहराई और तेज धारा को लेकर स्थानीय लोगों में अनेक बातें कही जाती हैं। पानी की रफ्तार ऐसी हो सकती है कि उसके बहाव का अंदाजा लगाना मुश्किल हो जाता है। इसलिए तेज बहाव के दौरान पानी के करीब जाना बेहद जोखिम भरा है।

इसी धुआं कुंड क्षेत्र से आगे बहने वाली काव नदी आसपास के कस्बों में बाढ़ का खतरा भी पैदा करती रही है। किनारे बसे गांवों पर कभी-कभी उसका बहाव कहर बनकर टूटता है। कई गांव जलमग्न हो जाते हैं और लोगों को नाव का उपयोग करना पड़ता है। बुजुर्ग बताते हैं कि पहले काव नदी की बाढ़ में जंगली जानवर भी बहकर दूर-दराज तक पहुंच जाते थे। यह स्थानीय लोगों की स्मृतियों पर आधारित विवरण है।
काव नदी किनारे बसे प्रमुख शहर और बाजार

सासाराम, जमुहार, राजपुर, बिक्रमगंज, सूर्यपुरा, दावथ, मलियाबाग, नावानगर, सिकरौल, डुमरांव और बक्सर जैसे शहर तथा बाजार इस नदी और इससे जुड़े जलप्रवाह क्षेत्र के आसपास बसे हुए हैं। इनमें कई स्थानों पर काव नदी लंबे समय तक सिंचाई और स्थानीय जीवन से जुड़ी रही है।
गंगा में विलीन हो जाती है काव नदी

सासाराम की कैमूर पहाड़ियों से आगे बहने वाली काव नदी राजपुर, बिक्रमगंज, दावथ, मलियाबाग, नावानगर और डुमरांव क्षेत्र से जुड़ती है। पुराने विवरणों के अनुसार, इसकी धारा नया भोजपुर के कोकिला ताल तक पहुंचकर आगे गंगा नदी के जलतंत्र से मिलती थी। बिहार जल संसाधन विभाग के नदी-बेसिन विवरण में भी बक्सर के पास काव-ठोरा नदी तंत्र का उल्लेख मिलता है।
ठोरा नदी और काव नदी का संबंध

बक्सर में गंगा नदी से मिलने वाली धाराओं के साथ काव और ठोरा, दोनों नदियों के नाम जुड़े हुए हैं। स्थानीय बोलचाल में कई बार इन धाराओं को एक-दूसरे से जोड़कर देखा जाता है। हालांकि काव नदी का नाम बदलकर पूरी तरह ठोरा हो जाता है, यह बात उपलब्ध स्रोतों से स्पष्ट रूप से स्थापित नहीं होती। इसलिए दोनों नदियों के नाम और उनके स्थानीय संबंध को अलग-अलग समझना जरूरी है।
ठोरा नदी की कहानी भी बहुत दिलचस्प है। ठोरा नदी का संबंध मेरे गांव यानी नोनहर से है। स्थानीय परंपरा में रोहतास जिले के बिक्रमगंज अनुमंडल के नोनहर गांव को ठोरा नदी का उद्गम स्थल माना जाता है। किंवदंतियों के अनुसार, ठोरा नाम के एक ब्राह्मण थे जो नदी बन गए थे। इसके बारे में विस्तार से कभी बाद में बताया जाएगा। मेरे गांव नोनहर में ठोरा बाबा का एक मंदिर भी है।
काव नदी के अस्तित्व पर संकट, इसे बचा लीजिए

काव नदी को अतिक्रमण, घटते जलप्रवाह और उपेक्षा से बचाना जरूरी है। 8 अप्रैल 2023 की एक रिपोर्ट के अनुसार, बक्सर में नदी की जमीन के अतिक्रमण और बिक्री का मुद्दा विधानसभा में उठने के बाद प्रशासन ने नदी क्षेत्र के सीमांकन के निर्देश दिए थे। फिर भी 30 अक्टूबर 2025 की रिपोर्ट में नदी के सिमटते दायरे, अतिक्रमण और किसानों की बढ़ती मुश्किलों की चिंता सामने आई।
यह सिर्फ एक नदी के सूखने या सिमटने का सवाल नहीं है। यह उस पानी, खेती, स्थानीय इतिहास और भावी पीढ़ियों से जुड़ा प्रश्न है, जिसने सदियों से इस इलाके को जीवन दिया है। अगर आज काव नदी को नहीं बचाया गया, तो आने वाली पीढ़ियां संभवतः इसे केवल तस्वीरों और किताबों में तलाशेंगी।
अगर इस लेख पर पाठकों की अच्छी प्रतिक्रिया मिलती है, तो हम काव नदी का भाग-2 भी प्रस्तुत करेंगे, जिसमें इसकी दर्द भरी दास्तान और सासाराम से निकलने वाली दूसरी नदी की कहानी बताएंगे।
एक सवाल आपसे भी: आपके गांव या शहर में काव नदी की स्थिति कैसी है? इसके पुराने स्वरूप, बाढ़, खेती या अतिक्रमण से जुड़ी कोई जानकारी या तस्वीर हो, तो कमेंट में जरूर साझा करें।


