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वास्‍तुकला देखने के शौकीन हैं तो सासाराम का ‘सूखा रौजा’ घूम आईए | Hasan Shah Suri Tomb

इतिहास अक्सर बादशाहों की वीरता और उनकी सल्तनत को याद रखता है, लेकिन उनके पीछे खड़े रिश्तों की कहानियाँ कहीं छूट जाती हैं। सासाराम का सूखा रौजा ऐसे ही एक पिता की कहानी सुनाता है।

सासाराम का नाम आते ही ज़हन में शेरशाह सूरी का भव्य मकबरा उभरता है। लेकिन इसी शहर में एक और ऐतिहासिक इमारत है। इसकी कहानी शेरशाह से पहले शुरू होती है।

नाम है—हसन शाह सूरी का मकबरा (Hasan Shah Suri Tomb)। सासाराम के लोग इसे प्यार से ‘सूखा रौजा’ कहते हैं।

यह कहानी सिर्फ पत्थरों, मेहराबों और गुंबदों की नहीं है। इसमें एक पिता और उसका बेटा है। साथ ही वह दौर भी है, जब सासाराम की पहचान उत्तर भारत के इतिहास से जुड़ रही थी।

दुनिया आज उस बेटे को शेरशाह सूरी के नाम से जानती है। मगर यहाँ उनके पिता हसन शाह सूरी की याद सँजोई गई है।

आपको इंडो-अफगान वास्तुकला पसंद है? या अपने शहर की विरासत को करीब से जानना चाहते हैं? दोनों ही वजहों से सूखा रौजा देखने लायक है।

तो आइए, इस मकबरे की कहानी शुरू से जानते हैं।

Hasan Shah Suri Tomb - सूखा रौजा सासाराम का ऐतिहासिक मकबरा
हसन शाह मक़बरा | Hasan Shah Suri Tomb |तस्वीर : सैयद ख़्वाजा

कौन थे हसन शाह सूरी? अफगानिस्तान से सासाराम तक की कहानी

हसन शाह सूरी एक अफगान पश्तून, यानी पठान परिवार से थे। उनके पिता इब्राहिम शाह सूरी अफगानिस्तान से भारत आए थे। वे पंजाब-हरियाणा के इलाके में घोड़ों का व्यापार करने लगे।

लेकिन व्यापार में उम्मीद के मुताबिक सफलता नहीं मिली। इसलिए इब्राहिम शाह और हसन शाह, दोनों सेना में शामिल हो गए। आगे चलकर वे पंजाब के बजवरा में बस गए।

इसके बाद कहानी में आता है सिकंदर लोदी का दौर। हसन शाह सूरी अपने अधिकारी जमाल खान के साथ जौनपुर पहुँचे। यहीं से उन्हें सासाराम की जागीरदारी मिली।

इस तरह एक अफगान परिवार की लंबी यात्रा आखिरकार सासाराम से जुड़ गई।

सूखा रौजा सासाराम - हसन शाह सूरी के मकबरे का दृश्य
सूखा रौज़ा सासाराम

हसन शाह सूरी की चार पत्नियाँ थीं। पहली पत्नी से उनके बड़े बेटे फरीद खान का जन्म हुआ।

आगे चलकर यही फरीद खान शेरशाह सूरी कहलाए। उन्होंने उत्तर भारत पर शासन किया। उनका शासनकाल उत्तर भारत के इतिहास के उल्लेखनीय दौरों में गिना जाता है।

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Hasan Shah Suri Tomb: पिता की याद में बना सूखा रौजा

अब सवाल उठता है—सासाराम में हसन शाह सूरी का यह मकबरा बनवाया किसने?

जवाब उसी फरीद खान से जुड़ा है। इतिहास उन्हें शेरशाह सूरी के नाम से याद करता है। शेरशाह सूरी ने अपने पिता हसन शाह सूरी के लिए यह मकबरा बनवाया था।

Hasan Shah Suri Tomb सासाराम - मुख्य गुंबद और मेहराबें
सूखा रौजा ,सासाराम | Sukha Rauza,Sasaram | तस्वीर : गार्गी मनीष

इस इमारत के प्रमुख वास्तुकार मीर मुहम्मद अलीवाल खान थे। खास बात यह है कि उन्होंने ही बाद में विश्वविख्यात शेरशाह सूरी के मकबरे की रूपरेखा तैयार की।

यानी सासाराम की इन दो ऐतिहासिक इमारतों में केवल पारिवारिक संबंध नहीं है। इनके बीच वास्तुकला का रिश्ता भी है।

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निर्माण में इस्लाम शाह सूरी की भूमिका

लेकिन इस निर्माण की कहानी यहीं खत्म नहीं होती। हसन शाह सूरी के पोते इस्लाम शाह सूरी ने भी मकबरे के कुछ हिस्से बनवाए। वे शेरशाह सूरी के पुत्र थे। उन्हें सलीम शाह सूरी भी कहा जाता है।

इतिहासकारों के अनुसार, मकबरे का निर्माण 1535 में शुरू हुआ और 1545 में पूरा हुआ माना जाता है। इस तरह इसमें परिवार की अगली पीढ़ी का योगदान भी जुड़ता है।

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लाल बलुआ पत्थर, मेहराबें और गुंबद: कैसी है इसकी बनावट?

सूखा रौजा की सबसे बड़ी विशेषता इसकी इंडो-अफगान वास्तुकला है। लाल बलुआ पत्थर से निर्मित इस ऐतिहासिक मकबरे का आधार वर्गाकार है, जबकि इसके किनारों और कोनों पर बनी खूबसूरत छतरियाँ तथा गुंबदनुमा मंडप इसकी भव्यता में चार चाँद लगाते हैं।

सदियों पुरानी इस इमारत की बारीक कारीगरी और स्थापत्य शैली आज भी देखने वालों को आकर्षित करती है। मकबरे की चारदीवारी के भीतर एक प्राचीन बावली भी मौजूद है, जो इस ऐतिहासिक परिसर का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसके बारे में आगे विस्तार से जानेंगे।

Sukha Rauza Sasaram - ऐतिहासिक मकबरे की इंडो-अफगान वास्तुकला
हसन शाह सुरी का मकबरा | Tomb of hasan shah | pc : ashish kaushik

अष्टकोणीय कक्ष और मेहराबों की बनावट

मकबरे का मुख्य कक्ष अष्टकोणीय है। उसके चारों ओर चौड़ा बरामदा बना है।

आठों ओर बरामदे में तीन-तीन मेहराबदार खुले हिस्से दिखाई देते हैं। उनके ऊपर तीन संबंधित गुंबदों की बनावट है। मुख्य कक्ष बरामदे की गुंबददार छतों से ऊँचा है।

इसी ऊँचाई और मेहराबों का क्रम इस इमारत को अलग पहचान देता है।

ज़रा ध्यान से देखें। खासियत केवल इसका आकार नहीं है। अलग-अलग हिस्सों का आपसी संतुलन भी उतना ही आकर्षित करता है।

इसी वजह से वास्तुकला में रुचि रखने वालों के लिए सूखा रौजा एक खास जगह है।

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के संरक्षण में है सूखा रौजा

हसन शाह सूरी का मकबरा - रोहतास के सूखा रौजा का दृश्य
Hasan Shah Suri Tomb sasaram Rohtas

हसन शाह सूरी का मकबरा स्थानीय लोगों और सैलानियों के बीच जाना-पहचाना ऐतिहासिक स्थल है। यह भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के अधीन है। साथ ही यह भारत सरकार की संपत्ति है।

लेकिन ऐसी इमारतें केवल किसी पुराने दौर का निशान नहीं होतीं। ये अपने शहर की साझा ऐतिहासिक पहचान का हिस्सा भी होती हैं।

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मुख्य कक्ष अक्सर बंद रहता है, लेकिन परिसर देखा जा सकता है

इतिहास को करीब से देखने की इच्छा रखने वालों के लिए यहाँ एक मायूसी भी है। मकबरे के मुख्य कक्ष के अंदर कब्रें हैं। यह कक्ष आम नागरिकों और पर्यटकों के लिए प्रायः बंद रहता है।

विडंबना देखिए, सदियों का इतिहास समेटे इस शानदार मकबरे की मुख्य इमारत के दरवाज़े आम लोगों और पर्यटकों के लिए प्रायः बंद रहते हैं। जिस इमारत को देखने और उसके इतिहास को करीब से समझने लोग यहाँ पहुँचते हैं, उसी के भीतर जाने का अवसर उन्हें नहीं मिल पाता।

सरकारी और प्रशासनिक उदासीनता का शिकार इस ऐतिहासिक धरोहर के परिसर में घूमने पर कोई पाबंदी नहीं है। पर्यटक बाहर से मकबरे का दीदार कर सकते हैं, वह भी बिना किसी टिकट के। हालाँकि, मुख्य इमारत के दरवाज़े केवल विशेष अवसरों पर ही खोले जाते हैं।

हसन शाह सूरी के मकबरे का मेहराबदार गलियारा, सासाराम
हसन शाह मक़बरा | Hasan Shah Suri Tomb |

चारदीवारी के भीतर मौजूद है एक पुरानी बावली

हसन शाह सूरी मकबरे के परिसर की पुरानी बावली, सासाराम
हसन शाह सुरी के अंदर बावली | तस्वीर अल्तमश अहमद

सूखा रौजा की चारदीवारी के भीतर एक छोटी-सी बावली भी मौजूद है। इसका प्रवेश द्वार परिसर के अंदर से है।

बताया जाता है कि नमाज़ से पहले हाथ धोने की रस्म के लिए इस बावली का उपयोग होता था। इस तरह जल संरचना का संबंध परिसर के पुराने धार्मिक और दैनिक जीवन से भी था।

परिसर में आज भी मौजूद है शाही मस्जिद

सूखा रौजा सासाराम के परिसर की प्राचीन शाही मस्जिद
सूखा रौजा सासाराम के परिसर की प्राचीन शाही मस्जिद

मकबरे की चारदीवारी के भीतर एक प्राचीन मस्जिद भी है। यह खुली रहती है। आसपास के लोग आज भी इसका उपयोग करते हैं।

इसलिए यहाँ केवल अतीत की निशानी नहीं दिखती। स्थानीय लोगों के जीवन से जुड़ी धार्मिक परंपरा भी दिखाई देती है।

सूखा रौजा कहाँ है और यहाँ कैसे पहुँचें?

हसन शाह सूरी के मकबरे की ओर जाने वाला रास्ता - शेरगंज सासाराम
हसन शाह सूरी के मकबरा कि ओर जाने वाला रास्ता

हसन शाह सूरी का मकबरा बिहार के रोहतास जिले में है। यह सासाराम शहर के शेरगंज मोहल्ले में स्थित है।

इसके पास ही शेरशाह सूरी का प्रसिद्ध मकबरा है। लोग उसे पानी रौजा भी कहते हैं।

रोहतास जिला मुख्यालय सासाराम रेल मार्ग से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है। आसपास के राज्यों से बस सेवाएँ भी मिलती हैं।

सासाराम पहुँचकर ई-रिक्शा या ऑटो से सूखा रौजा जाया जा सकता है। यहाँ आने के लिए कोई खास मौसम जरूरी नहीं है। साल के अलग-अलग महीनों में यात्रा की योजना बनाई जा सकती है।

शेरशाह सूरी के पिता का मकबरा - सूखा रौजा सासाराम बिहार
हसन शाह सुरी मक़बरा | Tomb of Hasan Shah Suri | pc : gargi manish , Ashish Kaushik

इतिहास की इस निशानी को जानना भी जरूरी है

सासाराम के इतिहास की बात होती है, तो शेरशाह सूरी का नाम सबसे पहले आता है। लेकिन सूखा रौजा हमें उसी इतिहास की एक और कड़ी से मिलवाता है। यह कड़ी है—शेरशाह के पिता हसन शाह सूरी।

एक परिवार की कहानी यहाँ दर्ज है। साथ में कई पीढ़ियों का निर्माण और सदियों पुरानी वास्तुकला भी है। ये सब एक ही परिसर में मिलते हैं।

इसलिए अगली बार सासाराम की ऐतिहासिक जगहों का ज़िक्र हो, तो सूखा रौजा भी याद कीजिए। यह वही जगह है जहाँ हसन शाह सूरी का मकबरा खड़ा है।

आखिर अपनी विरासत की पहचान केवल उसे देखने से नहीं बनती। उसकी कहानी जानना और उसे सँभालकर रखना भी उतना ही जरूरी है।

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