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रोहतास गढ़ किला के गर्भ में छिपा है भगवान हरिश्चंद्र से रोहतास सरकार तक का स्वर्णिम इतिहास | Rohtas Fort

कभी बादशाहों की सल्तनत, कभी तलवारों की गूँज और कभी खून से सनी दीवारों की रहस्यमयी कहानियाँ... शेरशाह की चाल, राजा मान सिंह की राजधानी और सदियों के उत्थान-पतन का गवाह रोहतास गढ़ का किला। 2,000 फीट की ऊँचाई पर खड़ी इसकी खामोश दीवारें आज भी अपने भीतर इतिहास के अनगिनत राज समेटे हुए हैं। आखिर क्या है इस किले की हकीकत और क्या है सदियों से चली आ रही कहानियों का सच? जानिए रोहतास गढ़ की वह दास्तान, जहाँ इतिहास, रहस्य और रोमांच एक-दूसरे से मिलते हैं।

रोहतास जिला मुख्यालय सासाराम से लगभग 55 किलोमीटर की दूरी पर विंध्य पर्वत शृंखला के अंतर्गत कैमूर पहाड़ी के शिखर पर रोहतास गढ़ का किला स्थित है। आपको बताते चलें कि प्राचीन काल में रोहतास जिले का नाम कारुष प्रदेश था, जिसका वर्णन ब्रह्मांड पुराण में भी आया है। रोहतास गढ़ के नाम पर ही इस क्षेत्र का नामकरण रोहतास हुआ था। कभी भारत के बादशाह शाहजहाँ भी इस रोहतास गढ़ किले में अपनी बेगम के साथ रहे हैं।

Table of Contents

रोहतास गढ़ किले की संरचना | Rohtas Fort Bihar

Rohtas Fort Bihar – कैमूर पहाड़ियों पर स्थित रोहतास गढ़ किले का दृश्य
Rohtas Fort | Ashish Kaushik

रोहतास गढ़ का किला आलीशान है। 28 मील तक किले का घेरा फैला हुआ है। इस किले के भीतर कुल 83 दरवाजे हैं, जिनमें चारा घोड़ाघाट, राजघाट, कठौतिया घाट और मेढ़ा घाट प्रमुख हैं।

किले के प्रवेश द्वार पर निर्मित हाथी, दरवाजों के बुर्ज और दीवारों पर बनी पेंटिंग अद्भुत हैं। रंगमहल, शीश महल, पंचमहल, खूंटा महल, आईना महल, रानी का झरोखा और मान सिंह की कचहरी आज भी किले में मौजूद हैं। परिसर में अनेक इमारतें हैं, जिनकी भव्यता देखते ही बनती है।

बुकानन के दस्तावेजों में ‘खून टपकने की बात’: सच या अंधविश्वास?

रोहतास गढ़ किले की ऐतिहासिक दीवारें और स्थापत्य | Rohtas Fort
Rohtas Fort | PC: RamaShankar

दो हजार फीट की ऊँचाई पर स्थित इस किले के बारे में कहा जाता है कि कभी इसकी दीवारों से खून टपकता था। अपने समय में विश्वभर में मशहूर अंग्रेज इतिहासकार फ्रांसिस बुकानन के रोहतास किले पर किए गए दावे आश्चर्यजनक हैं। इतिहासकार बुकानन ने लगभग 200 साल पूर्व रोहतास क्षेत्र की यात्रा की थी। तब उन्होंने पत्थर से निकलने वाले खून की चर्चा एक दस्तावेज में की थी।

उन्होंने अपने दस्तावेजों में कहा था कि इस किले की दीवारों से खून निकलता है। वहीं, आसपास रहने वाले कुछ लोग भी इसे सच मानते हैं, जबकि कुछ इसे अंधविश्वास मानते हैं। हम लोग इसे अंधविश्वास ही मानते हैं। विज्ञान के युग में कहाँ भूत, आत्मा, स्वर्ग और नरक हैं?

पौराणिक इतिहास

राजा हरिश्चंद्र का फिल्मी चित्रण – रोहतासगढ़ की पौराणिक कथा
Raja Harischandra | Movie

सोन नदी के बहाव वाली दिशा में पहाड़ी पर स्थित इस प्राचीन किले का निर्माण त्रेता युग में अयोध्या के राजा त्रिशंकु के पौत्र व राजा सत्य हरिश्चंद्र के पुत्र रोहिताश्व ने कराया था।

मध्यकालीन इतिहास

जनजातीय और हिंदू इतिहास

रोहतास गढ़ किले के परिसर में स्थित प्राचीन मंदिर | Rohtas Fort
Temple | Rohtas Fort

परंपरागत रूप से यह किला कुशवाहा (स्रोत: Serving Empire, Serving Nation: James Tod and the Rajputs of Rajasthan) और खरवार जनजाति के अधीन रहा।

इस्लामिक इतिहास

रोहतास गढ़ किले की प्राचीन इमारतों का दृश्य | Rohtas Fort Bihar
Rohtas Fort | PC: RamaShankar

16वीं सदी में रोहतास गढ़ किला मुसलमानों के अधिकार में चला गया और लंबे समय तक उनके अधीन रहा।

शेरशाह के अधीन हुआ रोहतास किला

शेरशाह सूरी का चित्र – रोहतास गढ़ किले के मध्यकालीन इतिहास से संबंधित
Sher Shah Suri

1539 ई. में शेरशाह और हुमायूँ में युद्ध ठनने लगा तो शेरशाह ने रोहतास के खरवार राजा नृपति से निवेदन किया कि मैं अभी मुसीबत में हूँ, अतः मेरे जनानखाने को कुछ दिनों के लिए रोहतास किले में ठहरने दिया जाए।

रोहतास के खरवार राजा नृपति ने पड़ोसी की मदद के ख्याल से प्रार्थना स्वीकार की और केवल औरतों को भेज देने का संदेश प्रेषित किया। कई सौ डोलियाँ रोहतास दुर्ग के लिए रवाना हुईं और पिछली डोली में स्वयं शेरशाह चला। आगे की डोलियाँ जब रोहतास दुर्ग पहुँचीं, तो उनकी तलाशी होने लगी। उनमें कुछ बूढ़ी औरतें थीं।

रोहतास गढ़ किले की ऐतिहासिक संरचना और स्थापत्य
Rohtas Fort | PC: Arjun Mehta

इसी बीच अन्य डोलियों से सशस्त्र सैनिक कूदकर बाहर निकले, पहरेदारों का कत्ल करके दुर्ग में प्रवेश कर गए। शेरशाह भी तुरंत पहुँचा और अपने कुशल युद्ध कौशल और प्लानिंग के दम पर किले पर कब्जा कर लिया। अपने ब्राह्मण मंत्री चूड़ामणि की मदद से शेरशाह सूरी इस किले पर कब्जा जमाने में कामयाब रहा। रोहतास किला खरवारों के हाथ से निकलकर बादशाह शेरशाह सूरी के अधीन हो गया।

बहुत सारे इतिहासकार शेरशाह के इस कदम को धोखा मानते हैं, जबकि बहुत से इतिहासकार कहते हैं कि गीता में श्रीकृष्ण ने कहा था कि ‘युद्ध में सब जायज़ है’। चाणक्य ने भी कहा था कि ‘राजा को ताकतवर होना चाहिए’। उसके लिए साम, दाम, दंड, भेद सब अपनाने चाहिए। शेरशाह ने यही किया।

भूत-प्रेत की अफवाहों को इसी घटना से बल मिला। आपको बताते चलें कि इतने बड़े कत्लेआम के कारण ही लोग इसे डरावना मानते हैं और भूत-प्रेत की आवाज़ों, खून आदि के अंधविश्वास से जोड़ते हैं।

शेरशाह इस किले से बहुत प्रभावित था

रोहतासगढ़ किले का स्थापत्य और पुराना परिसर | Rohtas Fort
Rohtas Fort | PC: RamaShankar

शेरशाह सूरी इस किले से इतना प्रभावित हुआ कि उसने रोहतास किले की फोटोकॉपी पाकिस्तान में झेलम नदी के किनारे बनवाई। वह किला बिल्कुल इसी तरह का है। नाम भी एक ही है—’रोहतास किला’।

पाकिस्तान में झेलम के पास स्थित रोहतास किला | Rohtas Fort Pakistan
Rohtas Fort of Pakistan | Via: TripAdvisor.com

वह विश्व धरोहर में शामिल है, लाखों पर्यटक वहाँ जाते हैं, जबकि यह असली वाला रोहतास किला सरकारी उदासीनता का शिकार है।

भूत-प्रेत की बातें अफवाह हैं

रोहतास गढ़ किले से संबंधित आज तक समाचार रिपोर्ट का थंबनेल
Aaj Tak News Channel on Rohtas Fort

शेरशाह के बाद कई और लोगों ने भी इस किले में राज किया है, जिनके बारे में आप नीचे पढ़ेंगे। अगर भूत-प्रेत होते तो ये लोग राज कैसे कर पाते? अभी भी कई ग्रामीण किले के ऊपर कभी-कभार सोते हैं। जो भी लोग रात में किले के अंदर रुके हैं, वे बताते हैं कि भूत-प्रेत की बातें अफवाह हैं। किले की चारदीवारी का निर्माण शेरशाह सूरी ने सुरक्षा के दृष्टिकोण से कराया था, ताकि कोई किले पर हमला न कर सके।

राजा मान सिंह की सूबेदारी में अकबर के अधीन रोहतास किला

राजा मान सिंह का ऐतिहासिक चित्रण – रोहतास गढ़ किले का मुगलकालीन इतिहास
Raja Man Singh | Kushwaha

1587 ई. में सम्राट अकबर ने अपने परमप्रिय कछवाहा (Kachwaha / Kushwaha) राजा मान सिंह (विवरण के लिए क्लिक करें) को बिहार व बंगाल का संयुक्त सूबेदार बनाकर रोहतास भेजा था। राजा मान सिंह ने उसी वर्ष रोहतास गढ़ को अपनी प्रांतीय राजधानी घोषित कर दिया था।

रोहतास सरकार में अहम था रोहतास किला

रोहतास गढ़ किले की ऐतिहासिक इमारतों और प्राचीन स्थापत्य का दृश्य
Rohtas Fort | PC: RamaShankar

प्रसिद्ध पुस्तक ‘शाहजहाँनामा’ के अनुसार, इखलास खाँ को सन् 1632–33 में रोहतास का किलेदार नियुक्त किया गया था। अकबरपुर से सटी पहाड़ी के नीचे स्थित एक शिलालेख के अनुसार, किलेदार नवाब इखलास खाँ को मकराइन परगना तथा चाँद, सीरिस और कुटुम्बा से बनारस तक की फौजदारी प्राप्त थी।

वह चैनपुर, मगसर, तिलौथू, अकबरपुर, बेलौंजा, विजयगढ़ व जपला का जागीरदार था। यानी उसके क्षेत्र में पुराना शाहाबाद, गया, पलामू और बनारस क्षेत्र शामिल थे, जिनका शासन वह रोहतास से करता था। 25 फरवरी 1702 को वजीर खाँ के पुत्र अब्दुल कादिर को रोहतास का किलेदार नियुक्त किया गया। उसी समय रोहतास का किला अवांछित तत्वों के काम आने लगा।

औरंगजेब ने अकबर की रोहतास सरकार में किया बदलाव

अकबर के समय से चली आ रही रोहतास सरकार में औरंगजेब ने कई परिवर्तन किए। औरंगजेब ने सातों परगनों को पुनर्गठित किया।

ब्रिटिश राज | आधुनिक इतिहास

1764 ई. में बक्सर युद्ध में मीर कासिम की अंग्रेजों से पराजय के बाद यह क्षेत्र अंग्रेजों के हाथ आ गया। 1774 ई. में अंग्रेज कप्तान थॉमस गोडार्ड ने रोहतास गढ़ को अपने कब्जे में लिया और उसे तहस-नहस कर दिया।

फिर बना रोहतास जिला

शाहाबाद गजेटियर में पुनः 1784 में रोहतास जिला स्थापित होने का उल्लेख मिलता है, जिसमें रोहतास, सासाराम व चैनपुर परगनों को मिलाकर जिला बनाया गया था।

शाहाबाद के अंदर चला गया रोहतास

ब्रिटिश बंदोबस्त में 1787 में शाहाबाद जिले की आधिकारिक रूप से स्थापना हुई। विलियम ऑगस्टस ब्रुक साहब शाहाबाद के पहले कलेक्टर बने। अब रोहतास अलग जिले के रूप में नहीं रहा। रोहतास जिला शाहाबाद के अंतर्गत चला गया और रोहतास गढ़ किले का भी रुतबा कम हुआ।

पहला स्वतंत्रता संग्राम

वीर कुंवर सिंह का चित्र – 1857 का स्वतंत्रता संग्राम
Veer Kunwar Singh | 1857 Struggle

स्वतंत्रता संग्राम की पहली लड़ाई (1857) के समय कुंवर सिंह के भाई अमर सिंह ने यहीं से अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह का संचालन किया था।

आजादी के बाद

शाहाबाद से टूटकर फिर बना रोहतास जिला

10 नवंबर 1972 को पुनः रोहतास जिले का निर्माण हुआ और इसका मुख्यालय सासाराम बनाया गया।

नक्सल आंदोलन का गवाह बना Rohtas Fort

नक्सल आंदोलन से संबंधित प्रतीकात्मक तस्वीर – रोहतासगढ़ का आधुनिक इतिहास
Reference: Naxalites

आजादी के बाद बंगाल के नक्सलबाड़ी से जमींदारों और सामंतवादी शोषण के खिलाफ शुरू हुए नक्सल आंदोलन का गवाह रोहतास किला भी बना। लंबे समय तक यह किला उत्तर प्रदेश, झारखंड और बिहार के सीमावर्ती नक्सलियों के लिए सेफ ज़ोन बना रहा। यह क्षेत्र नक्सलियों का गढ़ बन चुका था।

बाद में जब नक्सली अपने परंपरागत सिद्धांतों से भटक गए और सामाजिक न्याय से लूटमार की तरफ बढ़ने लगे, तो यह किला नक्सलियों की क्रूरता और अपराध का भी अड्डा बना रहा। आम आदमी तो दूर, पुलिस भी यहाँ नहीं पहुँचती थी।

आजादी के बाद पहली बार फहराया तिरंगा

रोहतास गढ़ किले पर तिरंगा फहराने से संबंधित तस्वीर
Photo: Ankit

नक्सलियों के चंगुल से मुक्त कराकर तत्कालीन एसपी विकास वैभव ने 26 जनवरी 2011 को पहली बार रोहतास किले पर तिरंगा फहराया था। (विस्तार से पढ़ने के लिए क्लिक करें)

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधीन है किला

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधीन रोहतासगढ़ किले का ऐतिहासिक परिसर
Rohtas Fort | PC: RamaShankar

भारत सरकार ने रोहतास किले को राष्ट्रीय स्मारक घोषित कर उसे भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधीन किया है। लेकिन यहाँ व्यवस्थाओं, संसाधनों तथा पर्यटकों की घोर कमी रहती है।

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