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मिशाल : प्रकाश पर्व पर मुस्लिम जत्थेदारों ने भी सासाराम गुरुद्वारा में अरदास किया | Chacha Faggumal Gurudwara and Shahjalal Pir Dargah

न दोस्ती ने मज़हब पूछा, न मोहब्बत ने कोई दीवार देखी। “यार, आप चल दिए और हमें कहा तक नहीं!” — एक दोस्त की विदाई पर दूसरे के दर्द की मार्मिक दास्तान। सासाराम की यह मौखिक किंवदंती आज भी इंसानियत और भाईचारे की मिसाल है। क्योंकि कुछ रिश्ते इतिहास के पन्नों में नहीं, लोगों के दिलों में हमेशा ज़िंदा रहते हैं।

Faggumal Gurudwara (चाचा फग्गुमल गुरुद्वारा), सासाराम में सिख समुदाय के प्रथम गुरु श्री गुरु नानक देव जी महाराज का प्रकाश पर्व धूमधाम से मनाया गया। प्रकाश पर्व के अवसर पर विगत कुछ वर्षों से चली आ रही परंपरा का भी निर्वहन किया गया।

Faggumal Gurudwara Sasaram Bihar - ऐतिहासिक चाचा फग्गुमल गुरुद्वारा सासाराम
ऐतिहासिक चाचा फग्गुमल गुरुद्वारा, सासाराम, बिहार

स्थानीय चाचा फग्गुमल गुरुद्वारे के बगल में स्थित हजरत शाहजलाल पीर दरगाह (Shahjalal Pir Dargah) से मुस्लिम समुदाय के लोगों का जत्था भी पहुँचा। उन्होंने गुरु साहिब को याद कर अरदास की। इस कार्यक्रम में दूर-दूर से आए संत-महात्मा, कथावाचक और रागी जत्थे भी शामिल थे।

दोस्ती की मिसाल: Faggumal Gurudwara और शाहजलाल पीर दरगाह

गुरु नानक प्रकाश पर्व सासाराम में चाचा फग्गुमल गुरुद्वारे में प्रसाद ग्रहण करते श्रद्धालु
प्रकाश पर्व पर चाचा फग्गुमल गुरुद्वारे में प्रसाद ग्रहण करते श्रद्धालु

आपको बताते चलें कि सिख और मुस्लिम संतों की जिगरी दोस्ती की किंवदंतियाँ एकता की मिसाल के रूप में सासाराम में मशहूर हैं। हालांकि, इस विशेष कथा का कोई ठोस लिखित ऐतिहासिक प्रमाण स्वतंत्र रूप से सत्यापित नहीं हो सका है।

मौखिक किंवदंती: दो संतों की अनोखी दोस्ती

Faggumal Gurudwara में गुरु नानक देव जी के प्रकाश पर्व पर प्रसाद वितरण
गुरु नानक देव जी के प्रकाश पर्व पर चाचा फग्गुमल गुरुद्वारे में प्रसाद वितरण

सिखों के नौवें गुरु श्री गुरु तेग बहादुर जी महाराज का वर्ष 1666 ईस्वी में अपने परिवार और संगत के साथ सासाराम आगमन हुआ था। प्रचलित मौखिक किंवदंती के अनुसार, सतगुरु के प्रवास के दौरान चाचा फग्गुमल साहिब जी ने अपने जिगरी दोस्त हजरत शाहजलाल पीर साहिब जी को सतगुरु से मिलाया।

प्रकाश पर्व पर चाचा फग्गुमल गुरुद्वारा सासाराम में सिख और हिंदू श्रद्धालु
प्रकाश पर्व पर चाचा फग्गुमल गुरुद्वारे में सिख और हिंदू श्रद्धालु

पीर साहिब ने गुरु जी से मिलकर रोम-रोम से शुक्राना किया। किंवदंती के अनुसार, गुरु तेग बहादुर जी के सासाराम से प्रस्थान करने के कुछ ही दिनों बाद चाचा फग्गुमल साहिब जी सचखंडवासी (स्वर्गवासी) हो गए।

गुरु नानक प्रकाश पर्व पर चाचा फग्गुमल गुरुद्वारे में मोमोज, पॉपकॉर्न और कॉफी का प्रसाद
गुरु नानक देव जी के प्रकाश पर्व पर चाचा फग्गुमल गुरुद्वारे में मोमोज, पॉपकॉर्न और कॉफी का प्रसाद

उनकी शवयात्रा में काफी भीड़ थी। चाचा फग्गुमल साहिब जी के स्वर्गवास के समय पीर साहिब सासाराम में नहीं थे। वह शवयात्रा के समय ही सासाराम पहुँचे। इतनी बड़ी भीड़ को जाते देख कौतूहलवश पूछ बैठे, “भाई, इतनी बड़ी शवयात्रा किसकी है?” लोगों ने बताया कि चाचा फग्गुमल जी की शवयात्रा है।

सिख मुस्लिम एकता सासाराम - चाचा फग्गुमल गुरुद्वारे में अरदास करते श्रद्धालु
ऐतिहासिक चाचा फग्गुमल गुरुद्वारे में अरदास करते सिख और हिंदू श्रद्धालु

पीर साहिब शवयात्रा के पास जाकर चाचा फग्गुमल साहिब जी के पार्थिव शरीर के दर्शन करते हुए बोले, “यार, ये दोस्ती कैसी? आप चल दिए और हमें कहा तक नहीं! खैर, चलो हम भी आ रहे हैं।”

किंवदंती के अनुसार, शवयात्रा से वापस लौटकर उन्होंने स्नान और वज़ू किया, नमाज़ अदा की और हमेशा के लिए लेट गए।

Shahjalal Pir Dargah के जत्थेदार चाचा फग्गुमल गुरुद्वारा सासाराम में चादर चढ़ाते हुए
चाचा फग्गुमल गुरुद्वारे में चादर चढ़ाते शाहजलाल पीर दरगाह के जत्थेदार

मौखिक किंवदंती के अनुसार, एक तरफ जहाँ गुरु के बाग के पास चाचा फग्गुमल साहिब जी का अंतिम संस्कार हो रहा था, वहीं दूसरी तरफ हजरत शाहजलाल पीर साहिब जी को सुपुर्द-ए-खाक किया जा रहा था।

चाचा फग्गुमल गुरुद्वारा का ऐतिहासिक महत्व

सासाराम का Faggumal Gurudwara केवल एक धार्मिक स्थल ही नहीं, बल्कि सिख इतिहास से जुड़ी महत्वपूर्ण विरासत भी है। रोहतास जिला प्रशासन की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार, वर्ष 1666 में सिखों के नौवें गुरु श्री गुरु तेग बहादुर जी महाराज अपनी धर्मपत्नी माता गुजरी देवी के साथ पूर्वी भारत की यात्रा के दौरान सासाराम आए थे। उन्होंने चाचा फग्गुमल जी के यहाँ 21 दिनों तक निवास किया था। यही स्थान आगे चलकर सिख श्रद्धालुओं का तीर्थस्थल बना।

बिहार पर्यटन के गुरु सर्किट विवरण में भी इस ऐतिहासिक गुरुद्वारे का उल्लेख मिलता है। इसके अनुसार, चाचा फग्गुमल साहिब जी का संबंध सिखों के तीसरे गुरु श्री गुरु अमर दास जी की परंपरा से था। उन्हें सिख धर्म का संदेश फैलाने के लिए भेजा गया था। बिहार पहुँचने के बाद उन्होंने अपने जीवन का अधिकांश समय सासाराम में बिताया।

गुरु सर्किट विवरण के अनुसार, वृद्धावस्था में चाचा फग्गुमल जी की गुरु साहिब से दोबारा मिलने की इच्छा थी। गुरु तेग बहादुर जी जब पूर्वी भारत की यात्रा पर आए, तो उनसे मिलने सासाराम पहुँचे। इस मुलाकात से जुड़ी धार्मिक परंपराएँ और स्मृतियाँ आज भी गुरुद्वारे की विरासत का हिस्सा हैं।

गुरुद्वारे के इतिहास के संबंध में अधिक जानकारी के लिए रोहतास जिला प्रशासन का आधिकारिक विवरण और बिहार पर्यटन का गुरु सर्किट विवरण पढ़ सकते हैं।

सिख-मुस्लिम एकता की मिसाल और सासाराम की साझा विरासत

चाचा फग्गुमल साहिब जी और हजरत शाहजलाल पीर साहिब जी की दोस्ती से जुड़ी मौखिक किंवदंती सासाराम की साझा सांस्कृतिक विरासत को एक अलग पहचान देती है। इस कहानी का सबसे मार्मिक पहलू दो मित्रों का वह रिश्ता है, जो धार्मिक पहचान से आगे बढ़कर इंसानी लगाव और आपसी सम्मान की भावना को सामने रखता है।

प्रकाश पर्व के अवसर पर शाहजलाल पीर दरगाह से मुस्लिम समुदाय के जत्थे का गुरुद्वारे पहुँचना इसी भाईचारे की परंपरा का एक उदाहरण है। जहाँ एक ओर श्रद्धालु गुरु नानक देव जी का प्रकाश पर्व मना रहे थे, वहीं दूसरी ओर अलग-अलग समुदायों के लोग भी इस आयोजन का हिस्सा बन रहे थे।

हालांकि, दोनों संतों के जीवन के अंतिम क्षणों से जुड़ी कथा को प्रमाणित इतिहास के बजाय स्थानीय मौखिक परंपरा के रूप में ही देखा जाना चाहिए। यह कहानी अपने भीतर दोस्ती, इंसानियत और धार्मिक सद्भाव का भावनात्मक संदेश समेटे हुए है।

सासाराम की धार्मिक और ऐतिहासिक विरासत के बारे में और जानने के लिए हमारी वेबसाइट पर प्रकाशित माँ ताराचण्डी धाम, सासाराम का लेख भी पढ़ सकते हैं। यह स्थल भी शहर की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा हुआ है।

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