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नदी का किनारा, ताज़ी हवाएँ और मन को सुकून चाहिए, तो चले आइए इंद्रपुरी डैम। | Indrapuri Dam

नदियाँ सिर्फ पानी नहीं बहातीं, अपने साथ सभ्यताओं की कहानियाँ भी लेकर चलती हैं। कभी सोन की लहरों पर व्यापार की नावें चलती थीं, आज इसकी नहरों से हजारों खेतों की उम्मीदें जुड़ी हैं। सुनहरी रेत, बहता पानी और समय की गवाही देता इंद्रपुरी बांध—यह सिर्फ एक निर्माण नहीं, रोहतास की जीवंत विरासत है। क्योंकि कुछ जगहें सिर्फ देखने के लिए नहीं होतीं, वे अपनी मिट्टी से जुड़ाव महसूस कराती हैं।

इंद्रपुरी बांध (Indrapuri Dam) रोहतास जिले के तिलौथू प्रखंड के इंद्रपुरी में सोन नदी पर निर्मित है। जैसा कि आपको मालूम होगा, हिंदुस्तान में हजारों छोटी-बड़ी नदियाँ हैं, लेकिन सोन और ब्रह्मपुत्र को ‘नद’ (पुल्लिंग) कहने की परंपरा भी रही है।

Indrapuri Dam सोन नदी पर इंद्रपुरी बांध रोहतास बिहार
Indrapuri Dam

मध्य प्रदेश के अमरकंटक के पास नर्मदा नदी के उद्गम क्षेत्र से पूर्व सोन नद का उद्गम होता है। अपने जन्मस्थान मध्य प्रदेश से निकलकर उत्तर प्रदेश, झारखंड और बिहार से होते हुए यह पटना के पास मनेर में गंगा नदी में मिल जाता है।

सोन नाम के पीछे रोचक तथ्य

सोन नदी का सुनहरा चमकदार बालू - Golden Sand of River Son
Golden Sand Of River Son

लोकमान्यता के अनुसार, पीले, चमकदार और सुनहरे रंग के बालू अर्थात रेत होने के कारण इस नद का नाम सोन पड़ गया। सोन नद का बालू सोने की तरह ही चमकदार होता है।

इंद्रपुरी बराज और सोन नदी का दृश्य - Indrapuri Barrage Rohtas
Indrapuri Dam

गृह निर्माण में सोन के बालू का उपयोग होता है। बिहार और झारखंड के अलावा उत्तर प्रदेश में भी सोन के बालू की भारी मांग रहती है।

मछलियों के लिए मशहूर

इंद्रपुरी डैम के पास मछली पकड़ने के जाल - Fish Nets at Indrapuri Dam
Fish Nets at Indrapuri Dam

सोन नद पर बना इंद्रपुरी डैम मछलियों के लिए मशहूर रहा है। इसमें कई तरह की स्वादिष्ट मछलियाँ पाई जाती हैं।

इंद्रपुरी डैम पर्यटन स्थल रोहतास - Indrapuri Dam Bihar
Indrapuri Dam

अब मछलियों की संख्या पहले की तुलना में कम बताई जाती है, लेकिन अभी भी खाली समय में लोग यहाँ खाना बनाने और पिकनिक मनाने के लिए आते हैं। बिहार पर्यटन विभाग भी इंद्रपुरी बराज को नदी के सुंदर नजारों और सूर्यास्त के लिए आकर्षक पर्यटन स्थल बताता है। घूमने के दौरान प्रतिबंधित क्षेत्रों से दूर रहना और सुरक्षा निर्देशों का पालन करना जरूरी है।

इंद्रपुरी डैम (Indrapuri Dam) का आर्किटेक्चर

इंद्रपुरी डैम की संरचना और सोन नदी पर बना बराज
Indrapuri Dam

इंद्रपुरी बांध 1,407 मीटर लंबा है। यही लंबाई इसे दुनिया के चौथे सबसे लंबे बराज के रूप में पहचान दिलाती है। बिहार पर्यटन विभाग के विवरण में भी इस ऐतिहासिक बराज की लंबाई और विशेषताओं का उल्लेख है।

एचसीसी कंपनी द्वारा इस बांध के ऊपर सड़क भी बनाई गई है। यह वही एचसीसी कंपनी है, जिसने दुनिया के सबसे लंबे फरक्का बराज का निर्माण किया था। कंपनी के अनुसार फरक्का बराज की लंबाई लगभग 2,253 मीटर है।

रोहतास के इंद्रपुरी बांध की तस्वीर - Indrapuri Dam
Indrapuri Dam

इतिहास

इंद्रपुरी बराज का ऐतिहासिक दृश्य रोहतास बिहार
Indrapuri Dam

इंद्रपुरी बांध का निर्माण 1960 के दशक में शुरू किया गया था। 1968 में यह बांध चालू हुआ था। मुख्य नहरें 209 मील, शाखा नहरें 149 मील और उनसे जुड़ी छोटी वितरण नहरें 1,235 मील तक फैली हैं।

इससे पहले 1873–74 में डेहरी में सोन नदी पर एनीकट के माध्यम से देश की पुरानी सिंचाई प्रणालियों में से एक विकसित की गई थी। बाद में पुराने एनीकट से लगभग आठ किलोमीटर ऊपर इंद्रपुरी बराज का निर्माण हुआ। दो संपर्क नहरों के माध्यम से नए बराज को पहले से मौजूद सोन नहर प्रणाली से जोड़ा गया। इस तरह इंद्रपुरी बराज सिर्फ देखने की जगह नहीं, बल्कि आसपास के कृषि क्षेत्र के लिए सिंचाई का महत्वपूर्ण आधार भी बना। सोन नदी से निकली नहरों ने रोहतास और आसपास के खेती वाले इलाकों में खेतों तक पानी पहुँचाने में बड़ी भूमिका निभाई। इस व्यवस्था ने नदी को खेती और ग्रामीण जीवन से गहराई से जोड़ा।

कभी व्यापार का साधन थीं सोन की नहरें

सोन नदी से निकली नहर का दृश्य - Sone Canal Near Indrapuri Dam
Nahar | Cannel From River Son

एक प्रकाशित ऐतिहासिक विवरण के अनुसार, 4,547 मालवाहक और 530 यात्रीवाहक छोटे जलपोत पंजीकृत थे। इन ऐतिहासिक संख्याओं की प्राथमिक अभिलेखों से स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है।

सोन नदी पर बना इंद्रपुरी बराज - Indrapuri Dam Rohtas
Indrapuri Dam

20वीं सदी के पूर्वार्द्ध में ये स्टीमर रोहतास के डेहरी और औरंगाबाद के बारुण से सोन नद में चलकर गंगा नदी तक पहुँचते थे। वहाँ से यात्री और माल बड़े स्टीमरों के जरिए पूरब दिशा में कोलकाता शहर तक और पश्चिम दिशा में बनारस होते हुए इलाहाबाद अर्थात प्रयागराज तक पहुँचते थे।

डेहरी और आसपास की ऐतिहासिक जगहों में रुचि हो तो डेहरी की ऐतिहासिक धूप घड़ी और रोहतास किले की कहानी भी पढ़िए।

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